
Up News: कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को गद्दार कहे जाने के बयान ने देश की राजनीति में नया तूफान खड़ा कर दिया है। भाजपा ने इसे सेना, राष्ट्र और लोकतांत्रिक मर्यादा का अपमान बताते हुए कांग्रेस पर चौतरफा हमला बोल दिया है, जबकि कांग्रेस समर्थक इसे आक्रामक विपक्ष की नई राजनीतिक शैली बता रहे हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या ऐसी बयानबाजी कांग्रेस को मजबूत कर रही है या फिर पार्टी की बची-खुची साख को भी कमजोर कर रही है!
पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस नेताओं के विवादित बयानों की लंबी फेहरिस्त बन चुकी है। कभी सनातन पर टिप्पणी, कभी हिंदुत्व पर सवाल, कभी प्रधानमंत्री के लिए व्यक्तिगत शब्दों का इस्तेमाल, तो कभी सेना और राष्ट्रवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों पर तीखे हमले, इन सबने कांग्रेस को एक आक्रामक विपक्ष के रूप में जरूर पेश किया, लेकिन साथ ही पार्टी पर नकारात्मक राजनीति करने का ठप्पा भी गहरा कर दिया। भाजपा इसी नैरेटिव को लगातार मजबूत कर रही है कि कांग्रेस सत्ता के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।
राजनीतिक जानकारों की मानें तो राहुल गांधी और कांग्रेस का एक वर्ग भाजपा के मजबूत राष्ट्रवादी नैरेटिव को तोड़ने के लिए बेहद तीखी भाषा का इस्तेमाल कर रहा है। रणनीति यह है कि लगातार आक्रामक हमलों से भाजपा विरोधी वोटों को भावनात्मक रूप से जोड़ा जाए। सोशल मीडिया के दौर में ऐसे बयान तुरंत वायरल होते हैं और कांग्रेस समर्थकों के बीच जोश भी पैदा करते हैं। लेकिन यही रणनीति अब उल्टी पड़ती भी दिखाई दे रही है।
देश का बड़ा मध्यम वर्ग, पहली बार वोट देने वाले युवा और राष्ट्रवादी सोच रखने वाला मतदाता ऐसी भाषा को विपक्ष की मर्यादा के खिलाफ मानता है। जब राजनीतिक हमला निजी कटाक्ष और गद्दार जैसे शब्दों तक पहुंच जाता है, तो मुद्दों की लड़ाई पीछे छूट जाती है। भाजपा तुरंत इसे राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्रविरोध की बहस में बदल देती है और पूरा चुनावी विमर्श महंगाई, बेरोजगारी और किसानों की समस्याओं से हटकर भावनात्मक मुद्दों पर आ जाता है।
यही कांग्रेस की सबसे बड़ी राजनीतिक विडंबना बनती जा रही है। पार्टी सरकार को घेरने के लिए हमला करती है, लेकिन फायदा भाजपा उठा लेती है। हर विवादित बयान के बाद भाजपा का आईटी सेल, संगठन और समर्थक पूरी ताकत से कांग्रेस को देश विरोधी मानसिकता वाली पार्टी साबित करने में जुट जाते हैं। इससे कांग्रेस का असली एजेंडा पीछे छूट जाता है और भाजपा का कोर वोटर और ज्यादा एकजुट हो जाता है।
साफ है कि राहुल गांधी की आक्रामक राजनीति कांग्रेस के कट्टर समर्थकों को उत्साहित जरूर करती है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की गंभीर विकल्प वाली छवि को भी लगातार नुकसान पहुंचा रही है। राजनीति में हमला जरूरी है, लेकिन जब शब्दों की मर्यादा टूटती है, तो विपक्ष का नैतिक हथियार भी कमजोर पड़ने लगता है। अब कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह तेज विपक्ष और जिम्मेदार विपक्ष के बीच संतुलन कैसे बनाए, वरना बयान सुर्खियां तो देंगे, लेकिन सत्ता का रास्ता नहीं।



