Mohan Bhagwat on Reservation: आरक्षण पर मोहन भागवत का बड़ा बयान, बोले- लाभ ले चुके लोग दूसरों के लिए पीछे हटें

RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि सामाजिक असमानता खत्म होने तक आरक्षण जरूरी है। उन्होंने आरक्षण का लाभ उठा चुके लोगों से दूसरों के लिए पीछे हटने की अपील की।

Mohan Bhagwat on Reservation: मोहन भागवत के आरक्षण को लेकर दिए गए ताजा बयान ने एक बार फिर इस बेहद संवेदनशील मुद्दे को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS के प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुवार को मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान जाति आधारित आरक्षण पर अपनी राय रखी। उन्होंने साफ कहा कि आरक्षण का मूल उद्देश्य सामाजिक समानता स्थापित करना है और जब तक समाज में असमानता और भेदभाव मौजूद है, तब तक आरक्षण की जरूरत बनी रहेगी। हालांकि, इसी दौरान उन्होंने आरक्षण का लाभ उठा चुके लोगों को लेकर जो बात कही, वह आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का मुद्दा बन सकती है।

मुंबई के नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान IIMUN के फाउंडर ऋषभ शाह ने मोहन भागवत से कई मुद्दों पर सवाल किए। इसी बातचीत में उनसे शिक्षा और रोजगार में आरक्षण को लेकर सवाल पूछा गया। उनसे यह भी जानना चाहा गया कि आरक्षण को कम करने या खत्म करने के बारे में कब सोचा जाना चाहिए। इसके जवाब में भागवत ने कहा कि इस विषय को डॉ. बीआर अंबेडकर की सोच के आधार पर समझना चाहिए।

मोहन भागवत ने कहा कि जब तक समाज में सामाजिक भेदभाव और असमानता बनी हुई है, तब तक आरक्षण जरूरी है। उनके मुताबिक आरक्षण कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य उन समुदायों और लोगों को आगे बढ़ने का अवसर देना है, जो लंबे समय से सामाजिक रूप से पिछड़े और वंचित रहे हैं। इसलिए आरक्षण को खत्म करने की चर्चा से पहले यह देखना जरूरी है कि समाज में वास्तविक समानता कितनी आई है।

कार्यक्रम के दौरान जब उनसे सीधा सवाल किया गया कि क्या आरक्षण को अनिश्चितकाल तक जारी रहना चाहिए या किसी समय इसे खत्म कर देना चाहिए, तो भागवत ने सीधे हां या ना में जवाब देने से परहेज किया। उन्होंने कहा कि इस सवाल का जवाब डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के नजरिए को समझकर तलाशना चाहिए। उनका कहना था कि अगर अंबेडकर की सलाह को ईमानदारी से लागू किया जाए तो इस मुद्दे को लेकर किसी तरह की समस्या नहीं होगी।

हालांकि, इसके बाद मोहन भागवत ने आरक्षण का लाभ उठा चुके लोगों को लेकर एक अहम बात कही। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने आरक्षण के जरिए सामाजिक और आर्थिक रूप से तरक्की कर ली है, उन्हें उदारता दिखाते हुए कुछ हद तक पीछे हटने के बारे में सोचना चाहिए, ताकि उनके समुदाय के दूसरे लोग भी आरक्षण के लाभ से आगे बढ़ सकें। उनके इस बयान को लेकर सियासी प्रतिक्रिया आने की संभावना है, क्योंकि आरक्षण का मुद्दा लंबे समय से भारतीय राजनीति में बेहद संवेदनशील रहा है।

भागवत की बात का एक अहम हिस्सा यह भी था कि आरक्षण का लाभ समाज के उन लोगों तक भी पहुंचना चाहिए, जिन्हें अभी तक इसका पर्याप्त फायदा नहीं मिल पाया है। उन्होंने कहा कि आरक्षित समुदायों के भीतर वर्गीकरण की मांग इसी सोच से सामने आई है कि आरक्षण का लाभ सभी जरूरतमंद लोगों तक पहुंचना चाहिए। उन्होंने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की ओर से इस मुद्दे पर की गई चर्चा का भी उल्लेख किया।

आरएसएस प्रमुख ने यह भी कहा कि आरक्षण को राजनीतिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक सामाजिक कल्याण से जुड़े उपायों को ईमानदारी और सच्चाई के साथ लागू किया जाना जरूरी है। अगर समाज में वास्तविक समानता स्थापित हो जाती है और सामाजिक भेदभाव खत्म होता है, तो उस स्थिति में आरक्षण की जरूरत को लेकर आगे चर्चा की जा सकती है।

भागवत ने आरक्षण को लेकर एक ऐसी सोच पर भी जोर दिया, जिसमें इसका इस्तेमाल सिर्फ व्यक्तिगत लाभ तक सीमित न रहे। उन्होंने कहा कि जिन लोगों को आरक्षण के जरिए आगे बढ़ने का अवसर मिला है, उन्हें खुद को मजबूत करने के साथ-साथ उन लोगों के लिए भी रास्ता तैयार करना चाहिए, जो अभी पीछे हैं। यानी आरक्षण से मिलने वाले अवसर का फायदा उठाकर आगे बढ़ने के बाद समुदाय के दूसरे जरूरतमंद लोगों को भी आगे आने का मौका दिया जाना चाहिए।

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आरएसएस प्रमुख का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में आरक्षण को लेकर अलग-अलग समुदायों और राजनीतिक दलों के बीच बहस लगातार जारी रहती है। शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण के साथ-साथ आरक्षित वर्गों के भीतर लाभ के समान वितरण का सवाल भी कई बार उठता रहा है। ऐसे में मोहन भागवत का यह बयान इस बहस को और हवा दे सकता है।

भागवत ने अपने बयान में यह संकेत देने की कोशिश की कि आरक्षण को लेकर बहस सिर्फ इसे खत्म करने या हमेशा जारी रखने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। असल सवाल यह है कि क्या समाज में वह समानता स्थापित हो पाई है, जिसके लिए आरक्षण जैसी व्यवस्था की जरूरत महसूस हुई थी। जब तक सामाजिक भेदभाव और असमानता मौजूद है, तब तक वंचित वर्गों के लिए विशेष अवसर और संरक्षण की आवश्यकता बनी रह सकती है।

वहीं, आरक्षण का लाभ पहले ही उठा चुके लोगों को लेकर भागवत की अपील को लेकर अलग-अलग राजनीतिक प्रतिक्रियाएं देखने को मिल सकती हैं। कुछ लोग इसे आरक्षण के लाभ को जरूरतमंदों तक पहुंचाने की दिशा में सोच के तौर पर देख सकते हैं, जबकि राजनीतिक दल इसे अलग-अलग नजरिए से पेश कर सकते हैं।

कुल मिलाकर मोहन भागवत ने आरक्षण को लेकर अपने ताजा बयान में एक तरफ यह स्पष्ट किया कि सामाजिक असमानता खत्म होने तक आरक्षण की जरूरत बनी रहेगी, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने उन लोगों से उदारता दिखाने की अपील की जो इसका लाभ लेकर आगे बढ़ चुके हैं। अब देखना होगा कि भागवत के इस बयान पर राजनीतिक दलों और आरक्षण से जुड़े संगठनों की क्या प्रतिक्रिया सामने आती है।

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