
Mecca Joint Defense Agreement: सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच हुई एक नई रक्षा डील ने पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण एशिया तक की भू-राजनीति को लेकर चर्चा तेज कर दी है। तीनों देशों ने मक्का में एक संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसे ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ के नाम से बताया जा रहा है। इस समझौते को लेकर इसे कई जगहों पर ‘इस्लामिक NATO’ जैसी संज्ञा दी जा रही है। हालांकि, इसे सीधे NATO का विकल्प या उसी तरह का सैन्य गठबंधन कहना अभी जल्दबाजी होगी। फिर भी तीनों देशों का साथ आना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जरूर माना जा रहा है।
यह समझौता मक्का में हुआ, जहां सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की मौजूदगी रही। तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को मजबूत करना इस समझौते का प्रमुख उद्देश्य बताया जा रहा है। इस डील के बाद सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि अगर इन देशों की सैन्य क्षमताओं को एक साथ देखा जाए तो यह समूह कितना प्रभावशाली हो सकता है।
पाकिस्तान के पास परमाणु हथियारों का बड़ा जखीरा माना जाता है। उपलब्ध अनुमानों के आधार पर पाकिस्तान के पास करीब 170 परमाणु हथियार होने की बात कही जाती है। ऐसे में यदि किसी भविष्य के साझा सुरक्षा ढांचे में पाकिस्तान की परमाणु क्षमता को जोड़ा जाए तो यह समूह परमाणु शक्ति संपन्न देशों के एक महत्वपूर्ण समूह के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि यह समझना जरूरी है कि किसी रक्षा समझौते का मतलब यह नहीं होता कि सदस्य देशों के परमाणु हथियार संयुक्त कमान के अधीन आ गए हैं।
तीनों देशों की पारंपरिक सैन्य क्षमताओं को भी जोड़कर देखा जाए तो यह गठजोड़ काफी बड़ा नजर आता है। रिपोर्टों में तीनों देशों की सेनाओं की संयुक्त संख्या करीब 20 लाख तक होने का दावा किया गया है। इसी तरह टैंकों की संख्या लगभग 7 हजार और बख्तरबंद वाहनों की संख्या करीब 90 हजार तक बताई जा रही है। लड़ाकू विमानों के मामले में भी तीनों देशों की संयुक्त ताकत करीब एक हजार विमान तक पहुंचने का अनुमान दिया जा रहा है।
नौसैनिक क्षमता के लिहाज से भी यह गठजोड़ महत्वपूर्ण हो सकता है। उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर तीनों देशों के युद्धपोतों की संयुक्त संख्या करीब 500 बताई जा रही है, जबकि पनडुब्बियों की संख्या 30 से ज्यादा होने का दावा किया गया है। हालांकि अलग-अलग स्रोतों में सैन्य उपकरणों और सक्रिय सैनिकों की संख्या को लेकर अंतर हो सकता है। इसके अलावा किसी सैन्य गठबंधन की वास्तविक ताकत सिर्फ हथियारों की संख्या से तय नहीं होती, बल्कि प्रशिक्षण, कमान और नियंत्रण, लॉजिस्टिक्स, खुफिया सहयोग और संयुक्त सैन्य अभ्यास भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इस समझौते की सबसे दिलचस्प बात इसमें शामिल तीनों देशों की अलग-अलग रणनीतिक स्थिति है। तुर्किये अमेरिका के नेतृत्व वाले NATO का सदस्य है। ऐसे में NATO के एक सदस्य देश का किसी अलग मुस्लिम देशों के रक्षा ढांचे में शामिल होना अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक समीकरणों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा सकता है। तुर्किये लंबे समय से पश्चिमी देशों और मुस्लिम दुनिया के बीच अपनी अलग कूटनीतिक भूमिका बनाने की कोशिश करता रहा है।
वहीं सऊदी अरब पश्चिम एशिया की सबसे प्रभावशाली शक्तियों में से एक है। वह G20 का सदस्य है और वैश्विक ऊर्जा बाजार में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। OPEC में भी सऊदी अरब की भूमिका बेहद अहम है। तेल, निवेश, व्यापार और क्षेत्रीय राजनीति के कारण सऊदी अरब के किसी भी बड़े रणनीतिक कदम का असर केवल खाड़ी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता।
पाकिस्तान के लिए यह समझौता कई स्तरों पर महत्वपूर्ण हो सकता है। इस्लामिक देशों के बीच अपनी रणनीतिक भूमिका मजबूत करना उसके लिए लंबे समय से प्राथमिकता रही है। पाकिस्तान के चीन के साथ भी गहरे रक्षा संबंध हैं और बीजिंग लंबे समय से इस्लामाबाद को सैन्य उपकरण और तकनीकी सहयोग देता रहा है। ऐसे में पाकिस्तान का सऊदी अरब और तुर्किये के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाना उसके लिए एक अतिरिक्त रणनीतिक मंच तैयार कर सकता है।
भारत के नजरिए से भी इस घटनाक्रम पर नजर रखना जरूरी होगा। भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से तनाव रहा है। इसके अलावा तुर्किये ने हाल के वर्षों में पाकिस्तान के साथ रक्षा संबंध मजबूत किए हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्किये से मिले ड्रोन के इस्तेमाल को लेकर भी चर्चा हुई थी। ऐसे में पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के बीच रक्षा सहयोग बढ़ने से दक्षिण एशिया की रणनीतिक स्थिति पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
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हालांकि इस समझौते को लेकर एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए कि किसी भी नए रक्षा समझौते को तुरंत ‘इस्लामिक NATO’ कहना राजनीतिक और मीडिया विश्लेषण हो सकता है, आधिकारिक स्थिति नहीं। NATO जैसी व्यवस्था में सामूहिक रक्षा, एकीकृत कमान और लंबे समय से विकसित सैन्य ढांचा शामिल है। मक्का समझौता वास्तव में किस स्तर का सैन्य सहयोग स्थापित करता है, यह उसके विस्तृत प्रावधानों और आने वाले समय में होने वाली गतिविधियों से ही स्पष्ट होगा।
फिलहाल इतना जरूर है कि सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान का एक साथ आना पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति का एक महत्वपूर्ण संकेत है। आने वाले समय में यदि तीनों देश संयुक्त सैन्य अभ्यास, खुफिया सहयोग, हथियारों की साझेदारी और सुरक्षा नीति में तालमेल बढ़ाते हैं, तो इस समझौते का रणनीतिक महत्व और बढ़ सकता है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि मक्का समझौता सिर्फ कूटनीतिक घोषणा तक सीमित रहता है या वास्तव में एक नए क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे की नींव बनता है।



