Global Update: पाकिस्तान की ‘मध्यस्थ’ राजनीति पर सवाल! ईरान-अमेरिका तनाव में क्यों फेल होता दिख रहा इस्लामाबाद?

ईरान को पाकिस्तान की भूमिका पर शक, ‘डबल गेम’ के आरोपों से शांति वार्ता में आई रुकावट

Global Update: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान ने खुद को एक अहम ‘मध्यस्थ’ के तौर पर पेश करने की कोशिश की, लेकिन अब यही दांव उल्टा पड़ता नजर आ रहा है। सीजफायर बढ़ने के बावजूद बातचीत आगे नहीं बढ़ पा रही है और इसके पीछे पाकिस्तान की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

दरअसल, पाकिस्तान के आर्मी चीफ असीम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता कराने की पहल की। वहीं, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी सीजफायर बढ़ाने की घोषणा कर इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की कोशिश की। लेकिन कूटनीतिक स्तर पर तस्वीर उतनी सरल नहीं है जितनी दिख रही है।

ईरान का अविश्वास क्यों बढ़ा?

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान को पाकिस्तान पर ऐतिहासिक रूप से कभी पूरी तरह भरोसा नहीं रहा। ईरान मामलों के जानकार अलेक्‍स वटांका के मुताबिक, दोनों देशों के बीच भले ही बड़े टकराव कम रहे हों, लेकिन रिश्ते कभी गहरे भरोसे वाले नहीं बन पाए।

अब हालात और जटिल हो गए हैं। ईरानी नेतृत्व के भीतर यह सवाल उठ रहा है कि पाकिस्तान इतनी सक्रियता क्यों दिखा रहा है? क्या वह वास्तव में शांति चाहता है या किसी और के एजेंडे पर काम कर रहा है? खासकर यह शक गहराया है कि कहीं पाकिस्तान अमेरिका के हितों को साधने की कोशिश तो नहीं कर रहा।

बैक-चैनल डिप्लोमेसी बनी विवाद की जड़

सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान ने ईरान को भरोसा दिलाया था कि वह संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ बातचीत को इस तरह मैनेज करेगा कि समझौता ईरान के हित में हो। लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ, तो तेहरान में नाराजगी बढ़ गई।

बताया जा रहा है कि असीम मुनीर के हालिया तेहरान दौरे के दौरान ईरान ने अपनी कुछ अहम मांगें रखीं, जिन्हें पाकिस्तान ने अमेरिका तक पूरी तरह नहीं पहुंचाया। यह बात ईरान को बेहद नागवार गुजरी और इससे दोनों देशों के बीच भरोसा और कमजोर हो गया।

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‘डबल गेम’ का आरोप

ईरान इस बात से भी नाराज है कि डोनाल्ड ट्रंप लगातार सार्वजनिक मंचों पर ईरान की आलोचना कर रहे हैं। तेहरान का मानना है कि यह स्थिति पाकिस्तान के आश्वासनों के बावजूद बनी हुई है, जिससे उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठता है।

इसके अलावा, खुफिया सूत्रों का दावा है कि पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ बातचीत में ईरान के रणनीतिक महत्व को भी कम करके पेश किया। इससे यह धारणा और मजबूत हुई कि पाकिस्तान ‘डबल गेम’ खेल रहा है—एक तरफ ईरान से नजदीकी दिखाना और दूसरी तरफ अमेरिका को साधना।

क्या पाकिस्तान की कूटनीति फेल हो गई?

मौजूदा हालात में ईरान पाकिस्तान को एक भरोसेमंद मध्यस्थ के रूप में नहीं देख रहा। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी हालिया प्रयासों को ‘बैड फेथ’ यानी अविश्वसनीय नीयत से जोड़कर देखा है।

यही कारण है कि पाकिस्तान की मध्यस्थता अब उल्टा असर डालती दिख रही है। जिस भूमिका के जरिए इस्लामाबाद खुद को वैश्विक मंच पर मजबूत करना चाहता था, वही अब उसकी कूटनीतिक कमजोरी बनती जा रही है।

अमेरिका-ईरान जैसे जटिल और संवेदनशील रिश्तों में मध्यस्थता करना आसान नहीं होता। पाकिस्तान ने यह दांव तो खेला, लेकिन भरोसे की कमी, संदेशों की गलत हैंडलिंग और दोहरी रणनीति के आरोपों ने उसकी कोशिशों को कमजोर कर दिया।

अब सवाल यह है—क्या पाकिस्तान इस विश्वास की खाई को भर पाएगा, या फिर वैश्विक राजनीति में उसकी ‘मध्यस्थ’ छवि को बड़ा झटका लग चुका है?

Written By: Anushri Yadav

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