नेपाल-भारत सीमा विवाद पर पीएम बालेन्द्र शाह का बयान, कूटनीतिक समाधान पर दिया जोर

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने भारत-नेपाल सीमा विवाद को लेकर महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा जैसे विवादित क्षेत्रों के मुद्दे का समाधान केवल कूटनीतिक बातचीत और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर ही संभव है। उनके बयान के बाद नेपाल में राजनीतिक और विशेषज्ञ स्तर पर नई बहस शुरू हो गई है।

सीमा विवाद का ऐतिहासिक संदर्भ

प्रधानमंत्री शाह के अनुसार, यह विवाद ब्रिटिश भारत के समय से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि सीमा निर्धारण से जुड़े कई पहलुओं को ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुराने नक्शों के आधार पर समझने की जरूरत है।

शाह ने बताया कि नेपाल ने इस मुद्दे पर भारत के साथ-साथ चीन और ब्रिटेन से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भों का भी अध्ययन किया है। उनका मानना है कि स्थायी समाधान के लिए इतिहास को ध्यान में रखना जरूरी है।

भारत को भेजा गया कूटनीतिक नोट

नेपाल सरकार ने सीमा विवाद के संबंध में भारत को एक आधिकारिक कूटनीतिक नोट भेजा था। प्रधानमंत्री शाह ने कहा कि भारत की ओर से इसका जवाब भी प्राप्त हो चुका है।

उन्होंने बताया कि दोनों देशों ने आपसी संवाद के जरिए विवाद सुलझाने की इच्छा जताई है। इसके लिए इतिहासकारों, सर्वे विशेषज्ञों और तकनीकी टीमों की मदद लेने पर भी सहमति बनी है।

शाह के बयान पर बढ़ा विवाद

अपने संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री शाह ने कहा कि सीमा से जुड़े कुछ मामलों में केवल भारत ही नहीं, बल्कि नेपाल की ओर से भी कुछ क्षेत्रों पर दावे किए गए हैं। उनके इस बयान ने नेपाल में विवाद खड़ा कर दिया।

कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह टिप्पणी नेपाल की पारंपरिक राष्ट्रवादी राजनीति से अलग दृष्टिकोण पेश करती है।

पूर्व राजदूतों और विशेषज्ञों ने जताई आपत्ति

नेपाल के पूर्व राजदूत नीलांबर आचार्य और दीप कुमार उपाध्याय ने प्रधानमंत्री के दावे पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि नेपाल द्वारा भारतीय क्षेत्रों पर कब्जे का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड या प्रमाण मौजूद नहीं है।

आचार्य ने कहा कि भारत और नेपाल के बीच लगभग 97 प्रतिशत सीमा संबंधी मुद्दों का समाधान पहले ही हो चुका है और केवल कुछ हिस्सों पर मतभेद बाकी हैं।

सीमा विशेषज्ञों की राय

सीमा मामलों के जानकार बुद्धि नारायण श्रेष्ठ ने भी प्रधानमंत्री शाह की टिप्पणी से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि नेपाल ने कभी भारतीय भूमि पर कब्जा नहीं किया है।

उनके अनुसार, कुछ सीमावर्ती इलाकों में स्थानीय लोगों द्वारा पारंपरिक भूमि उपयोग को कब्जा नहीं माना जा सकता। इसलिए इस तरह के दावों को तथ्यों के आधार पर परखा जाना चाहिए।

समाधान के लिए संवाद जरूरी

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और नेपाल के बीच ऐतिहासिक रूप से घनिष्ठ संबंध रहे हैं। ऐसे में सीमा विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों का समाधान केवल बातचीत, पारस्परिक विश्वास और तकनीकी सहयोग के जरिए ही संभव है।

दोनों देशों की सरकारें पहले भी कई सीमा विवादों का समाधान कर चुकी हैं। ऐसे में शेष विवादित क्षेत्रों पर भी शांतिपूर्ण और स्वीकार्य समाधान की उम्मीद जताई जा रही है।

निष्कर्ष

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह का हालिया बयान सीमा विवाद को लेकर नई चर्चा का कारण बना है। जहां उन्होंने कूटनीतिक प्रयासों और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर समाधान की बात कही, वहीं उनके कुछ दावों पर विशेषज्ञों और पूर्व अधिकारियों ने सवाल भी उठाए हैं। फिलहाल दोनों देशों के बीच संवाद जारी है और भविष्य में इस मुद्दे पर आगे की प्रगति पर सभी की नजर बनी हुई है।

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