
Delimitation: संसद के मानसून सत्र में एक बार फिर परिसीमन (Delimitation) का मुद्दा राजनीतिक बहस के केंद्र में है। कांग्रेस जहां मौजूदा परिसीमन प्रस्ताव का विरोध कर रही है, वहीं भाजपा यह सवाल उठा रही है कि 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को जिस परिसीमन का लाभ मिला था, आज उसी प्रक्रिया का विरोध क्यों किया जा रहा है।
दरअसल, 2002 में गठित परिसीमन आयोग ने 2001 की जनगणना के आधार पर संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया था। यह नई व्यवस्था पहली बार 2009 के लोकसभा चुनाव में लागू हुई। ध्यान देने वाली बात यह है कि उस समय राज्यों को मिलने वाली लोकसभा सीटों की संख्या नहीं बदली थी, बल्कि केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्गठन किया गया था।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2009 में शहरी क्षेत्रों के विस्तार, जनसंख्या के नए वितरण और कई सीटों की नई संरचना का कांग्रेस को कुछ राज्यों में लाभ मिला। हालांकि, यह कहना कि कांग्रेस की जीत का एकमात्र कारण परिसीमन था, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। उस चुनाव में यूपीए सरकार की योजनाएं, नेतृत्व, गठबंधन और स्थानीय राजनीतिक समीकरण भी महत्वपूर्ण कारक रहे थे।
अब 2026 में तस्वीर अलग है। केंद्र सरकार नए परिसीमन कानून के जरिए जनसंख्या के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण की दिशा में आगे बढ़ रही है। विपक्ष, खासकर कांग्रेस और दक्षिण भारत के कई दलों को आशंका है कि इससे जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों का संसद में प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम हो सकता है। दूसरी ओर केंद्र सरकार का कहना है कि किसी भी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा और सभी राज्यों की सीटें बढ़ेंगी।
यानी, 2009 का परिसीमन और 2026 का प्रस्तावित परिसीमन दो अलग-अलग प्रकृति की प्रक्रियाएं हैं। 2009 में केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदली थीं, जबकि मौजूदा बहस लोकसभा सीटों के पुनर्वितरण और प्रतिनिधित्व के नए स्वरूप को लेकर है। यही वजह है कि यह मुद्दा संसद से लेकर राज्यों की राजनीति तक चर्चा का विषय बना हुआ है।


