
UP News: आज के परिवेश में जहाँ अन्य विमर्श एक स्तरीय आयाम पर हैं, वहीं बालसाहित्य का क्षितिज एक विशेष विमर्श की माँग कर रहा है। बहुधा जब हम बालसाहित्य की बात करते हैं तो पाठ्यपुस्तकों की कविता-कहानियाँ सुनाकर इसे इतिश्री मान लेते हैं, लेकिन बालकों का साहित्य और उनकी जिज्ञासा किसी वस्तु अथवा व्यक्ति के बारे में बता देना मात्र ही समाधान नहीं है।
बालमन की कल्पना को तृप्त करने के साथ-साथ उन्हें ऐतिहासिक, पौराणिक, राष्ट्रधार्मिक और शौर्य गाथाओं से जोड़कर उनका चरित्रोन्मुखी विकास करना तथा उनमें पर्यावरण, रिश्तों, नीति, ज्ञान और मनोरंजन से भरपूर साहित्य सृजन करना आज बालसाहित्य की परम आवश्यकता है।
इन्हीं विचारों को केंद्र में रखकर साहित्यकार एवं अभिनेत्री गीतिका वेदिका ने समर्पयामि फ़ाउण्डेशन, टीकमगढ़ (मध्यप्रदेश) के तत्वावधान में मई के प्रथम सप्ताह में ‘बाल साहित्य गोष्ठी एवं विमर्श’ का आयोजन किया। बालगोपाल की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम को ‘अम्मा की बगिया’ नाम दिया गया।
इस भव्य बाल-सांस्कृतिक आयोजन के मुख्य अतिथि मध्यप्रदेश शासन साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे रहे।
कार्यक्रम में टीकमगढ़ के स्थानीय साहित्यकार आर.पी. तिवारी, गुलाब सिंह भाऊ, राजीव नामदेव राना, प्रमोद गुप्ता ‘मृदुल’, मुन्नालाल मिश्रा, सत्यनारायण तिवारी, एस.आर. सरल, स्वप्निल तिवारी, रविंद्र यादव, विशाल कड़ा, अनवर साहिल, एम.एस. श्रीवास्तव, लीना कुलथिया, रश्मि गोयल, मीनू गुप्ता, प्रीति सिंह परमार, अजीत श्रीवास्तव, पूरनचन्द्र गुप्ता, कौशल किशोर भट्ट, पं. महेंद्र द्विवेदी, शीलचन्द्र जैन, विजय मेहता, रामगोपाल रैकवार एवं चाँद मुहम्मद आख़िर (जिला समन्वयक, मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी) सहित बड़ी संख्या में बालक-बालिकाएँ उपस्थित रहीं।
गीतिका वेदिका की माताजी उमा देवी पाराशर के जन्मदिवस पर आयोजित यह गोष्ठी एक बालसाहित्य कार्यशाला के रूप में संपन्न हुई। स्वयं उमा देवी युवावस्था में सरस्वती शिशु मंदिर में संगीत के माध्यम से बच्चों को बालगीत सिखाया करती थीं। उनसे प्रेरणा प्राप्त कर गीतिका वेदिका ने साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय हस्तक्षेप किया।
दीपप्रज्ज्वलन एवं ‘या कुंदेंदु तुषारहार धवला’ सरस्वती वंदना के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। मुख्य अतिथि डॉ. दवे का स्वागत तिलक, शाल-श्रीफल एवं समर्पयामि का शुभंकर-चिन्ह ‘ज्योतिदीप’ भेंट कर गीतिका वेदिका और सरस्वती शिशु मंदिर के पूर्व विद्यार्थी योगेश्वर पाराशर ने किया। ‘अतिथि पुस्तकार्पण सत्र’ में साहित्यकारों ने अपनी स्वरचित कृतियाँ उन्हें भेंट कीं।
मुख्य अतिथि डॉ. दवे ने कहा कि “उमा देवी मेरी पूर्ववर्ती आचार्या रही हैं, इस नाते मैं उन्हें प्रणाम करने आया हूँ।” उन्होंने सुझाव दिया कि अब वे पन्नों पर लिखे बाल साहित्य के स्फुट गीतों को संकलित कर पुस्तकाकार प्रकाशित करें।
डॉ. दवे ने कहा कि गीतिका वेदिका ने बालसाहित्य की गोष्ठी में लड्डूगोपाल से अध्यक्षता कराकर एक नया प्रयोग किया है। इस प्रकार के नवाचार बालसाहित्य की आवश्यकता हैं। उन्होंने अपने जीवनवृत्त का उल्लेख करते हुए बताया कि हायर सेकेंडरी के बाद वे सरस्वती शिशु मंदिर में आचार्य बने, फिर प्रधानाचार्य रहे और बाद में विद्याभारती की बालसाहित्य पत्रिका ‘देवपुत्र’ के संपादक भी बने। उन्होंने कहा कि जब पत्र-पत्रिकाओं की लोकप्रियता घट रही थी, तब ‘देवपुत्र’ पत्रिका ने 3 लाख 71 हजार प्रतियों के प्रसार के साथ विश्व कीर्तिमान स्थापित किया था।
पराग और नंदन जैसी बाल पत्रिकाओं के बंद होने पर चिंता व्यक्त करते हुए डॉ. दवे ने गीतिका वेदिका के इस आयोजन को समय की आवश्यकता बताया। उन्होंने गीतिका वेदिका द्वारा रचित सरस और मनोवैज्ञानिक बालसाहित्य की सराहना करते हुए उन्हें निरंतर बाल रचनाएँ सृजित करने के लिए प्रेरित किया।
अपने जीवनकाल में सात से आठ लाख बच्चों से सीधा संवाद कर चुके डॉ. दवे ने कहा कि कॉमिक्स आदि में दिखाए जाने वाले कई महापुरुष काल्पनिक हैं और वे आदर्श नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि वीर शिवाजी, वीर सावरकर और महाराणा प्रताप जैसे महानायक हमारे वास्तविक आदर्श हैं। हमें उनके आदर्शों को अपनाकर अपने जीवन संघर्ष में नीति और साहस का पालन करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मेवाड़ की रक्षा करने वाले महाराणा प्रताप अस्सी किलो का भाला उठाते थे। उनकी रक्षा-जंजीर, कवच और शिरस्त्राण भारी लोहे के बने होते थे। उनका नाम इतिहास में शौर्य, साहस, पराक्रम और त्याग के लिए अमर है। ऐसे महानायक बच्चों के आदर्श होने चाहिए, न कि केवल काल्पनिक पात्र। उन्होंने बालकों को पाश्चात्य प्रभाव और वामपंथी विचारधाराओं से बचाकर ऐतिहासिक शौर्य गाथाओं से परिचित कराने की आवश्यकता पर बल दिया।

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अंत में डॉ. दवे ने कहा कि वे आज मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक के रूप में नहीं, बल्कि गीतिका वेदिका के आमंत्रण पर अपनी पूर्ववर्ती आचार्या उमा देवी पाराशर को प्रणाम करने और शुभकामनाएँ देने आए हैं, जिन्होंने बच्चों को राष्ट्रधर्म के गीत सिखाए।
उन्होंने गीतिका वेदिका के इस विचार की भी सराहना की कि माता-पिता के जन्मदिवस जैसे समारोह उनके समक्ष मनाए जाने चाहिए, जिससे उन्हें आत्मिक सुख प्राप्त होता है।
कार्यक्रम में स्वल्पाहार के रूप में घर में बने व्यंजन, गोरस सामग्री तथा दोना-पत्तल का उपयोग कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया गया। थर्मोकोल जैसी दूषित सामग्री के प्रयोग से परहेज़ कर ‘अम्मा की बगिया’ की अवधारणा को सार्थक रूप दिया गया।
आभार ज्ञापन करते हुए संचालिका गीतिका वेदिका भावविभोर हो उठीं। उन्होंने कहा कि बालसाहित्य के चिंतन पर गहरी दृष्टि रखने वाले डॉ. दवे ने उनके घर आकर समर्पयामि परिवार के आयोजन को कल्पना से भी अधिक सुंदर बना दिया। उन्होंने उपस्थित सभी साहित्यकारों, बालक-बालिकाओं एवं सहयोगियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि अब से ‘अम्मा की बगिया’ में इस प्रकार की रचनात्मक गोष्ठियाँ नियमित रूप से आयोजित की जाएँगी, जिन्हें वे ‘बालसभा’ नाम देती हैं।
वास्तव में टीकमगढ़ नगर में समर्पयामि जैसी छोटी संस्था द्वारा बालसाहित्य की ऐसी सार्थक गोष्ठी आयोजित किया जाना एक सराहनीय पहल है।



