
International News: लैटिन अमेरिकी देश पेरू ने लंबे समय से चल रही फाइटर जेट खरीद प्रक्रिया को खत्म करते हुए आखिरकार संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ F-16 फाइटर जेट की डील को फाइनल कर दिया है। इस फैसले के साथ ही फ्रांस के राफेल फाइटर जेट और स्वीडन के ग्रिपेन फाइटर जेट को बड़ा झटका लगा है।
यह डील सिर्फ एक रक्षा सौदा नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति, आर्थिक हितों और रणनीतिक दबाव का बड़ा उदाहरण बनकर सामने आई है।
2012 से चल रही थी टक्कर, आखिर F-16 पर लगी मुहर
पेरू पिछले एक दशक से अपनी वायुसेना को आधुनिक बनाने की कोशिश कर रहा था। इस दौरान F-16, राफेल और ग्रिपेन के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा रही।
2025 तक यह संकेत मिलने लगे थे कि पेरू स्वीडन के ग्रिपेन जेट की ओर झुक सकता है और इसके लिए शुरुआती मंजूरी भी दी जा चुकी थी। लेकिन अचानक हालात बदले और अमेरिका ने इस डील में पूरी ताकत झोंक दी।
अमेरिका का दबाव और बदली रणनीति
रिपोर्ट्स के मुताबिक, संयुक्त राज्य अमेरिका इस डील को अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहता था। पेरू में चीन का बढ़ता प्रभाव अमेरिका के लिए चिंता का विषय बन चुका है, खासकर खनिज संसाधनों (जैसे कॉपर) को लेकर।
इसी वजह से अमेरिका ने न सिर्फ कूटनीतिक दबाव बनाया, बल्कि कीमतों में भी बड़ा बदलाव किया। शुरुआत में जहां F-16 की कीमत काफी अधिक थी, वहीं बाद में इसे घटाकर लगभग 166 मिलियन डॉलर प्रति विमान कर दिया गया। यदि भविष्य में 24 विमान खरीदे जाते हैं, तो यह कीमत और कम होकर करीब 145 मिलियन डॉलर तक जा सकती है।
डील के बीच पेरू में सियासी भूचाल
इस सौदे के दौरान पेरू में जबरदस्त राजनीतिक उथल-पुथल देखने को मिली। पेंशन सुधार को लेकर बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुए और सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे।
राष्ट्रपति दीना बोलुआर्टे के नेतृत्व वाली सरकार पर सवाल उठे, जिसके चलते कई राजनीतिक बदलाव हुए। इस विवाद के बीच पेरू के विदेश और रक्षा मंत्री ने इस्तीफा दे दिया, जिससे यह साफ हो गया कि डील को लेकर सरकार के भीतर भी मतभेद थे।
नई सरकार के आने के बाद इस डील को तेजी से मंजूरी दी गई और अंततः अमेरिका के साथ समझौता साइन कर दिया गया।
अमेरिकी चेतावनी ने बढ़ाया दबाव
इस पूरे घटनाक्रम में एक बड़ा मोड़ तब आया जब पेरू में तैनात अमेरिकी राजदूत ने साफ संकेत दिया कि यह डील “अमेरिका के हितों” से जुड़ी हुई है।
उन्होंने कहा कि अमेरिका क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने के लिए हर संभव कदम उठाएगा। इसे एक तरह की कूटनीतिक चेतावनी के रूप में देखा गया, जिसने पेरू के फैसले को प्रभावित किया।
यूक्रेन के लिए क्यों अहम है यह डील?
यूक्रेन इस समय बड़े पैमाने पर फाइटर जेट खरीदने की योजना बना रहा है, जिसमें राफेल और ग्रिपेन जैसे विकल्प शामिल हैं।
पेरू का यह फैसला दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय रक्षा सौदों में सिर्फ तकनीकी क्षमता ही नहीं, बल्कि राजनीतिक दबाव और रणनीतिक रिश्ते भी अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में यूक्रेन को भी अपने फैसले में इन पहलुओं को ध्यान में रखना होगा।
पेरू का F-16 डील एक साधारण रक्षा खरीद नहीं, बल्कि वैश्विक ताकतों के प्रभाव, कूटनीति और आर्थिक हितों का मिला-जुला परिणाम है। इससे यह भी साफ होता है कि आने वाले समय में रक्षा बाजार में प्रतिस्पर्धा और भी तेज होगी, जहां तकनीक के साथ-साथ राजनीति भी निर्णायक भूमिका निभाएगी।
Written By: Anushri Yadav



