MPs MLAs Criminal Cases : सांसदों-विधायकों पर 4,192 आपराधिक मामले लंबित, 14 मुख्यमंत्रियों के खिलाफ भी केस; सुप्रीम कोर्ट में क्यों उठा मुद्दा?

MPs MLAs Criminal Cases : सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे के मुताबिक 326 मौजूदा सांसदों और 14 मुख्यमंत्रियों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। सांसदों-विधायकों से जुड़े 4,192 मामले लंबित हैं।

MPs MLAs Criminal Cases : देश के मौजूदा सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल ताजा हलफनामे ने राजनीतिक व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। हलफनामे के मुताबिक, 326 मौजूदा सांसदों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों की जानकारी घोषित की है। इनमें लोकसभा के 251 और राज्यसभा के 75 सांसद शामिल हैं।

वहीं, 14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी चुनावी हलफनामों में अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। सांसदों और विधायकों से जुड़े मौजूदा और पूर्व मामलों की कुल संख्या 4,192 बताई गई है।

सुप्रीम कोर्ट क्यों पहुंचा मामला?

सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों के जल्द निपटारे को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले से सुनवाई कर रहा है। इसी मामले में अदालत की सहायता कर रहे एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने ताजा हलफनामा दाखिल किया है।

इसमें आपराधिक मामलों की मौजूदा स्थिति के साथ-साथ इनके जल्द निपटारे के लिए विशेष अदालतों और समयबद्ध सुनवाई से जुड़े सुझाव दिए गए हैं। आंकड़े एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी ADR के रिकॉर्ड पर आधारित बताए गए हैं।

लोकसभा के 251 सांसदों पर आपराधिक मामले

हलफनामे के अनुसार, 543 लोकसभा सदस्यों में से 251 सांसदों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। इनमें 170 सांसदों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले बताए गए हैं। गंभीर मामलों में ऐसे अपराध शामिल हैं जिनमें दोष साबित होने पर पांच साल या उससे अधिक की सजा हो सकती है।

राज्यसभा में भी स्थिति चिंताजनक है। 233 सदस्यों में से 75 सांसदों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। इनमें 40 सांसदों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले बताए गए हैं।

14 मुख्यमंत्रियों ने भी घोषित किए केस

हलफनामे में मुख्यमंत्रियों से जुड़े आंकड़े भी सामने आए हैं। देश के 28 राज्यों में से 14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अपने चुनावी हलफनामों में आपराधिक मामले घोषित किए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के खिलाफ सबसे ज्यादा 89 मामले घोषित हैं। इसके बाद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ 29 और कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के खिलाफ 19 मामले बताए गए हैं।

यह आंकड़े चुनावी हलफनामों में घोषित मामलों पर आधारित हैं। किसी व्यक्ति के खिलाफ मामला लंबित होना अपने आप में दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है।

किन राज्यों के सांसदों पर ज्यादा मामले?

राज्यवार आंकड़ों में केरल सबसे ऊपर है। यहां 20 में से 19 सांसदों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। इनमें 11 सांसदों के खिलाफ गंभीर मामले बताए गए हैं।

तेलंगाना में 17 में से 14, ओडिशा में 21 में से 16 और झारखंड में 14 में से 10 सांसदों ने आपराधिक मामले घोषित किए हैं। तमिलनाडु में 39 में से 26 सांसदों के खिलाफ मामले दर्ज होने की जानकारी सामने आई है।

उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में भी कई सांसदों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों की जानकारी चुनावी हलफनामों में दी है।

2018 से मामलों की संख्या में बड़ी कमी क्यों नहीं?

एमिकस क्यूरी विजय हंसारिया ने सुप्रीम कोर्ट के सामने चिंता जताई है कि निगरानी और विशेष अदालतों की व्यवस्था के बावजूद सांसदों-विधायकों से जुड़े लंबित मामलों की संख्या में 2018 के बाद अपेक्षित कमी नहीं आई है।

आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में 1,243 मामलों का निपटारा हुआ, लेकिन इसी अवधि में 1,050 नए मामले भी दर्ज हुए। यानी मामलों के निपटारे के बावजूद नए मामलों की वजह से लंबित मामलों का बोझ बना हुआ है।

एक साल में मामलों के निपटारे का सुझाव

एमिकस क्यूरी ने सुप्रीम कोर्ट से सांसदों और विधायकों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए बनाई गई विशेष अदालतों की व्यवस्था को मजबूत करने का सुझाव दिया है।

सुझाव है कि विशेष अदालतों को प्राथमिकता के आधार पर केवल सांसदों और विधायकों से जुड़े आपराधिक मामलों की सुनवाई करनी चाहिए और मामलों को एक साल के भीतर निपटाने की दिशा में प्रभावी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।

इसका उद्देश्य लंबे समय तक चलने वाली सुनवाई और बार-बार होने वाली तारीखों को कम करना है।

सुप्रीम कोर्ट पहले भी दे चुका है निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले भी सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों के जल्द निपटारे पर जोर दिया है। 9 नवंबर 2023 के फैसले में अदालत ने हाई कोर्ट को ऐसे मामलों की निगरानी के लिए विशेष बेंच गठित करने और विशेष अदालतों में अनावश्यक स्थगन से बचने के निर्देश दिए थे।

अदालत का लगातार जोर इस बात पर रहा है कि जनप्रतिनिधियों से जुड़े आपराधिक मामलों की सुनवाई अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रहनी चाहिए। ताजा हलफनामा इसी व्यापक न्यायिक प्रक्रिया में मामलों की मौजूदा स्थिति और उनके निपटारे की चुनौती को सामने रखता है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?

जनप्रतिनिधियों के खिलाफ आपराधिक मामलों का लंबित रहना केवल न्यायिक प्रक्रिया का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि, चुनावी पारदर्शिता और जवाबदेही से भी जुड़ा सवाल है।

सुप्रीम कोर्ट के सामने अब चुनौती यह है कि विशेष अदालतों और समयबद्ध सुनवाई के जरिए पुराने मामलों का निपटारा कैसे तेज किया जाए, ताकि जनप्रतिनिधियों से जुड़े मुकदमे वर्षों तक लंबित न रहें।

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