
Weather Update : विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने वर्ष 2026 में मजबूत अल-नीनो विकसित होने की आधिकारिक पुष्टि करते हुए दुनिया भर के देशों को सतर्क रहने की सलाह दी है। संगठन के अनुसार, इस जलवायु घटना के कारण वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी, भीषण गर्मी, सूखा और कई क्षेत्रों में बाढ़ जैसी चरम मौसमी परिस्थितियां देखने को मिल सकती हैं। भारत में इसका सबसे बड़ा असर मानसून पर पड़ने की आशंका जताई गई है।
क्या है अल-नीनो?
अल-नीनो एक प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है, जिसमें मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर का समुद्री जल सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। यह ‘एल-नीनो साउदर्न ऑसीलेशन’ (ENSO) चक्र का हिस्सा है। आमतौर पर यह हर 2 से 7 साल के बीच सक्रिय होता है और करीब 9 से 12 महीने तक प्रभावी रहता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, इस बार प्रशांत महासागर की सतह के नीचे का तापमान सामान्य से लगभग 6 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है, जो एक मजबूत अल-नीनो के संकेत दे रहा है।
जून से अगस्त 2026 के बीच बढ़ेगा असर
WMO की ग्लोबल सीजनल क्लाइमेट अपडेट रिपोर्ट के मुताबिक जून से अगस्त 2026 के दौरान अल-नीनो सक्रिय रहने की संभावना 80 प्रतिशत है, जबकि नवंबर तक इसके बने रहने की संभावना 90 प्रतिशत से अधिक है।
रिपोर्ट के अनुसार, इस दौरान दुनिया के अधिकांश क्षेत्रों में तापमान सामान्य से अधिक रह सकता है। इससे हीटवेव, जल संकट और कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने का खतरा बढ़ जाएगा।
भारत में कमजोर हो सकता है मानसून
दक्षिण एशियाई जलवायु पूर्वानुमानों के आधार पर WMO ने कहा है कि अल-नीनो के प्रभाव से भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया में मानसूनी बारिश सामान्य से कम रह सकती है।
भारत की अर्थव्यवस्था और कृषि काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है। यदि बारिश में कमी आती है तो फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जलाशयों में पानी कम हो सकता है और कई क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है। इसका असर खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
दुनिया के अन्य हिस्सों में बाढ़ और सूखे का खतरा
रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिणी अमेरिका, अमेरिका के कुछ दक्षिणी राज्यों, हॉर्न ऑफ अफ्रीका और मध्य एशिया में सामान्य से अधिक बारिश और बाढ़ की आशंका है। वहीं ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, मध्य अमेरिका और कैरिबियाई देशों में सूखे और गर्म मौसम का खतरा बढ़ सकता है।
क्या जलवायु परिवर्तन बढ़ा रहा है खतरा?
वैज्ञानिकों का कहना है कि अल-नीनो एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और इसके सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन से जुड़े होने के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। हालांकि, ग्लोबल वार्मिंग के कारण पहले से गर्म हो चुकी धरती पर अल-नीनो का प्रभाव और अधिक गंभीर हो सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक गर्म वातावरण अधिक नमी और ऊर्जा धारण करता है, जिससे बाढ़, हीटवेव और सूखे जैसी आपदाएं पहले की तुलना में अधिक खतरनाक रूप ले सकती हैं।
देशों को तैयार रहने की सलाह
WMO और संयुक्त राष्ट्र ने सभी देशों से कृषि, स्वास्थ्य, ऊर्जा और जल प्रबंधन क्षेत्रों में पहले से तैयारी करने की अपील की है। संगठन का कहना है कि समय पर चेतावनी प्रणाली और जलवायु अनुकूल रणनीतियां अपनाकर संभावित नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना और अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत बनाना भविष्य की जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिए बेहद जरूरी है।



