निस्तब्ध नज़ारों की नर्म नब्ज़: शेखा झील की अनकही धड़कनें

अलीगढ़ की शेखा झील रामसर आर्द्रभूमि बनने के बाद पर्यावरण और इको-टूरिज्म का बड़ा केंद्र बन रही है। 166 पक्षी प्रजातियों और प्रवासी पक्षियों का यह आश्रय प्रकृति प्रेमियों को आकर्षित कर रहा है।

प्रणय विक्रम सिंह

सुबह की धुंध अभी पूरी तरह छंटी नहीं है। पानी की सतह पर हल्की-हल्की लहरें हैं, जैसे किसी शांत मन ने नींद में धीमे से करवट ली हो। दूर किनारे पर एक बगुला स्थिर खड़ा है। इतना स्थिर कि लगता है, झील ने अपनी एक सफेद चुप्पी पानी के पास रख छोड़ी हो।

यहीं, अलीगढ़ के पास फैली लगभग 40 हेक्टेयर की शेखा झील में, लेखिका, फोटोग्राफर और वरिष्ठ प्रशासक संगीता सिंह बार-बार लौटती हैं। किसी पर्यटक की तरह नहीं, किसी शोधकर्ता की तरह भी नहीं… बल्कि किसी ऐसी संवादिनी की तरह, जो प्रकृति की धीमी धड़कनों को सुनना जानती हो।

वे मुस्कुराते हुए कहती हैं, ‘यह जगह देखी नहीं जाती… महसूस की जाती है। यहां कुछ भी आपका ध्यान खींचने की कोशिश नहीं करता, लेकिन यदि आप ठहर जाएं तो समझ आता है कि यह स्थिरता नहीं, एक जीवित स्पंदन है।’

उनकी आवाज में वही ठहराव है, जो झील के जल में दिखाई देता है। न कोई आग्रह, न कोई प्रदर्शन… केवल एक सधा हुआ मौन।

कैमरे से संवाद तक की यात्रा

शुरुआत में वे यहां कैमरा लेकर आई थीं। उद्देश्य था पक्षियों को कैद करना, दृश्य को दस्तावेज बनाना। लेकिन समय के साथ यह रिश्ता बदलता गया। वे बताती हैं कि ‘एक समय के बाद लगा कि मैं देख नहीं रही… मैं महसूस कर रही हूं। मैं कैद नहीं कर रही, मैं आत्मसात कर रही हूं।’

हर सर्दी में प्रवासी पक्षी यहां आते हैं… बार-हेडेड गीज़, ग्रेलेग गीज़, नॉर्दर्न पिंटेल… हजारों किलोमीटर की यात्रा के बाद। वे कुछ समय ठहरते हैं और फिर लौट जाते हैं। लेकिन जो रह जाता है, वह है एक शांत विस्मय। एक ऐसा सुकून, जो शोर से नहीं, मौन से जन्म लेता है। जहां सन्नाटा भी सांस लेता है।

आर्द्रभूमियों को अक्सर लोग खाली जगह समझ लेते हैं। न पहाड़, न झरने, न कोई तात्कालिक चमत्कार… केवल पानी, कीचड़ और सन्नाटा। लेकिन संगीता इस सन्नाटे को सुनना जानती हैं। वे कहती हैं कि ‘लोग इन्हें निर्जीव समझ लेते हैं, लेकिन जब आप ठहरते हैं, तब महसूस होता है कि यहां जीवन की कितनी जटिल परतें एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।’

एक बगुले का घंटों स्थिर खड़ा रहना। एक किंगफिशर का अचानक जल में उतरना। दूर से आती प्रवासी पक्षियों की पुकार। ये सब मिलकर ऐसा अनुभव रचते हैं, जिसमें शांति भी बोलती हुई महसूस होती है।

शेखा झील केवल जल का विस्तार नहीं है। यह जैव-विविधता का एक जीवित ग्रंथ है। यहां लगभग 166 पक्षी प्रजातियों का संसार सांस लेता है। हर सर्दी में यह झील प्रवासी पक्षियों का आश्रय बन जाती है, मानो जल उन्हें पहचानता हो, और वे जल को।

रामसर मान्यता: किसी मौन सत्य को शब्द मिलना

जब शेखा झील को रामसर आर्द्रभूमि का दर्जा मिला, तब दुनिया ने इसे नए सम्मान के साथ देखा। लेकिन संगीता के लिए यह कोई अचानक घटी घटना नहीं थी। वे कहती हैं ‘जो लोग इस जगह को जानते हैं, उनके लिए यह नया नहीं था। यह ऐसा था, जैसे किसी मौन सत्य को आखिरकार शब्द मिल गए हों।’

वे झील की ओर देखते हुए कहती हैं कि ‘यह जगह बहुत नाजुक है… जैसे कांच पर रखा पानी। छोटे-छोटे बदलाव भी इसका संतुलन बिगाड़ सकते हैं।’

प्रकृति को देखना और उसे छेड़े बिना लौट आना

पास स्थित पटना बर्ड सैंक्चुरी और शेखा झील मिलकर इको-टूरिज़्म की बड़ी संभावनाएं रखते हैं। लेकिन संगीता इस संभावना को लेकर बेहद स्पष्ट हैं। वे कहती हैं, ‘पर्यटन हो… लेकिन संवेदनशीलता के साथ। लोग आएं, देखें, महसूस करें… लेकिन प्रकृति को छेड़े बिना।’

उनकी दृष्टि में प्रकृति को उपयोग की वस्तु नहीं, सह-अस्तित्व की अनुभूति मानना, सबसे बड़ी पर्यावरण चेतना है।

कुछ स्थान पुकारते नहीं… प्रतीक्षा करते हैं

बातचीत समाप्त होने लगती है। संगीता कहती हैं, ‘शेखा झील आपको यह सिखाती है कि हर अर्थपूर्ण चीज शोर में नहीं होती। कुछ स्थान ध्यान नहीं मांगते… वे बस प्रतीक्षा करते हैं।’

और शायद यही शेखा का सबसे गहरा सत्य है। यह कोई पर्यटन स्थल नहीं, एक अनुभव है। एक ऐसा दर्पण, जिसमें प्रकृति केवल दिखाई नहीं देती… वह आपको स्वयं से मिलाती है। यहां स्थिरता भी स्पंदन है। यहां मौन भी संवाद करता है। और शायद इसी कारण शेखा झील से लौटने के बाद भी उसका जल आपके भीतर बना रहता है जैसे मन की किसी शांत परत पर प्रकृति ने अपनी उंगलियों के निशान छोड़ दिए हों।

Show More

Related Articles

Back to top button