परिसीमन का सियासी गणित: नायडू के ‘50% फॉर्मूले’ पर थरूर का ‘सैलरी’ वाला तंज और दक्षिण की चिंता

राजनीति में अक्सर गणित के अपने मायने होते हैं। इन दिनों आगामी ‘लोकसभा परिसीमन’ का मुद्दा इसी सियासी गणित की वजह से सुर्खियों में है। इस संवेदनशील विषय पर कांग्रेस के दिग्गज नेता व सांसद शशि थरूर और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के बीच एक दिलचस्प और तीखी वैचारिक जंग देखने को मिली है।

 

विवाद की जड़: नायडू का 50 प्रतिशत वाला दावा

इस पूरी बहस की शुरुआत चंद्रबाबू नायडू के एक हालिया साक्षात्कार से हुई। नायडू ने दावा किया था कि जब भी लोकसभा परिसीमन लागू होगा, तो इसके परिणामस्वरूप देश के सभी राज्यों में कम से कम 50 प्रतिशत लोकसभा सीटों का इजाफा होगा। उनका यह बयान सतह पर तो प्रतिनिधित्व बढ़ने की बात करता है, लेकिन इसके पीछे छिपे राजनीतिक असंतुलन को शशि थरूर ने बारीकी से पकड़ लिया।

 

थरूर का पलटवार: ‘मालिक और ड्राइवर’ का सटीक उदाहरण

नायडू के इस ‘समान प्रतिशत वृद्धि’ वाले तर्क की हवा निकालते हुए शशि थरूर ने एक बेहद दिलचस्प और आम आदमी की समझ में आने वाला उदाहरण पेश किया।

 

उन्होंने कहा कि मान लीजिए चंद्रबाबू नायडू का वेतन 2 लाख रुपये है और उनके ड्राइवर का वेतन 20 हजार रुपये है। अगर दोनों की सैलरी में 50 फीसदी का इंक्रीमेंट (वृद्धि) होता है, तो नायडू की सैलरी बढ़कर 3 लाख रुपये हो जाएगी, जबकि ड्राइवर की सैलरी सिर्फ 30 हजार रुपये तक ही पहुंचेगी।

 

थरूर का संदेश बिल्कुल साफ था— भले ही प्रतिशत के हिसाब से वृद्धि समान दिख रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत में दोनों के बीच का अंतर और भी ज्यादा चौड़ा हो जाएगा। जो पहले से मजबूत है, वह और अधिक ताकतवर हो जाएगा।

 

असली चिंता: उत्तर प्रदेश बनाम केरल का समीकरण

‘सैलरी’ के इस उदाहरण का सीधा संबंध उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व की खाई से था। थरूर ने नायडू को आगाह करते हुए ध्यान दिलाया कि वर्तमान में उत्तर प्रदेश के पास 80 लोकसभा सांसद हैं, जबकि केरल के पास मात्र 20 सांसद हैं।

 

यदि 50% वृद्धि का फॉर्मूला लागू होता है, तो उत्तर प्रदेश की सीटें बढ़कर 120 हो जाएंगी और केरल की सीटें सिर्फ 30 रह जाएंगी। दोनों राज्यों के बीच सीटों का जो अंतर अभी 60 का है, वह बढ़कर 90 का हो जाएगा। थरूर ने कड़े शब्दों में चेतावनी दी कि “दक्षिण के राज्यों का राजनीतिक वजूद मत भूलिए।” यह असंतुलन राष्ट्रीय स्तर पर दक्षिण भारत की आवाज को कमजोर कर सकता है।

 

निष्कर्ष का नया नजरिया

थरूर और नायडू के बीच का यह संवाद इस बात का प्रमाण है कि लोकसभा परिसीमन महज नक्शे पर लकीरें खींचने या आबादी गिनने की कोई तकनीकी प्रक्रिया नहीं है। यह सीधे तौर पर देश के राजनीतिक शक्ति-संतुलन, क्षेत्रीय अधिकारों और सामाजिक न्याय से जुड़ा हुआ एक गंभीर मुद्दा है। थरूर के तर्कों ने यह साबित कर दिया है कि सियासी दावों को जब गणित की कसौटी पर परखा जाता है, तो तस्वीर का एक बिल्कुल नया और चिंताजनक पहलू सामने आता है।

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