
Dabur FSSAI Action: ‘डाबर इंडिया एक साथ दो बड़े मामलों को लेकर चर्चा में है। एक तरफ भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने कंपनी के कई खाद्य उत्पादों पर किए जा रहे ‘100% Natural’, ‘100% Pure’ और ‘100% Organic’ जैसे दावों पर आपत्ति जताते हुए उन्हें तुरंत हटाने का निर्देश दिया है। वहीं दूसरी तरफ हिमाचल प्रदेश के उपभोक्ता आयोग ने फफूंद मिले जूस के मामले में कंपनी को एक उपभोक्ता को 70 हजार रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। इन दोनों मामलों ने कंपनी के उत्पादों और विज्ञापन दावों को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
FSSAI के मुताबिक, डाबर की वेबसाइट और प्रचार सामग्री में कई खाद्य उत्पादों को ‘100% Natural’, ‘100% Pure’, ‘100% Organic’ और ‘100% Purity’ जैसे शब्दों के साथ बेचा और प्रचारित किया जा रहा था। इनमें शहद, देसी गाय का घी, नारियल तेल, एप्पल साइडर विनेगर, नारियल पानी, नारियल दूध और अन्य खाद्य उत्पाद शामिल हैं।
खाद्य सुरक्षा नियामक का कहना है कि ‘100%’ जैसे दावे पूरी तरह प्रमाणित नहीं किए जा सकते। ऐसे शब्द उपभोक्ताओं को यह विश्वास दिलाते हैं कि उत्पाद में किसी भी तरह की कोई मिलावट या प्रसंस्करण नहीं हुआ है, जबकि कई मामलों में इसकी पुष्टि संभव नहीं होती। इसी कारण खाद्य सुरक्षा एवं मानक (विज्ञापन एवं दावे) विनियम, 2018 के तहत ऐसे दावों को भ्रामक माना गया है।
एफएसएसएआई ने विशेष रूप से डाबर होममेड कोकोनट मिल्क का भी उल्लेख किया। नियामक के अनुसार इस उत्पाद का प्रचार ‘100% Purity’ के दावे के साथ किया जा रहा था, जबकि यह एक मिश्रित (Compound) खाद्य उत्पाद है। नियमों के अनुसार ऐसे उत्पादों पर इस तरह का दावा नहीं किया जा सकता।
इसके अलावा जांच के दौरान कुछ उत्पादों पर ‘जैविक भारत (Jaivik Bharat)’ का लोगो भी पाया गया। एफएसएसएआई ने इस पर भी आपत्ति जताई और कहा कि किसी उत्पाद पर यह प्रमाणन चिह्न तभी लगाया जा सकता है जब उसके लिए आवश्यक मंजूरी और प्रमाणन प्राप्त हो। बिना वैध अनुमति इस लोगो का इस्तेमाल नियमों का उल्लंघन माना जाएगा।
नियामक ने यह भी बताया कि डाबर को पहले भी ऐसे दावे हटाने के निर्देश दिए जा चुके थे। इसके बावजूद कंपनी की ओर से पर्याप्त सुधार नहीं किए गए। अब FSSAI ने कंपनी को 15 दिनों के भीतर सभी जरूरी बदलाव करने और Action Taken Report (ATR) जमा करने का निर्देश दिया है। यदि तय समय में नियमों का पालन नहीं किया जाता है तो आगे भी नियामकीय कार्रवाई की जा सकती है।
इसी बीच डाबर को एक अन्य मामले में भी बड़ा झटका लगा। हिमाचल प्रदेश के उपभोक्ता आयोग ने कंपनी को एक उपभोक्ता को 70,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। मामला सावन महीने के दौरान खरीदे गए रियल फ्रूट पावर मौसंबी जूस से जुड़ा है।
शिकायतकर्ता ने आयोग को बताया कि उसने व्रत के दौरान एक लीटर का जूस पैक खरीदा था। जूस पीने के दौरान उसमें फफूंद (फंगस) दिखाई दी। उसका कहना था कि इस घटना से न केवल उसके स्वास्थ्य पर खतरा पैदा हुआ बल्कि उसका धार्मिक व्रत भी टूट गया, जिससे उसे मानसिक और धार्मिक रूप से गहरा आघात पहुंचा।
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आयोग के अध्यक्ष हिमांशु मिश्रा और सदस्यों आरती सूद तथा नारायण ठाकुर की पीठ ने माना कि किसी उपभोक्ता को खराब खाद्य उत्पाद मिलना केवल गुणवत्ता का मामला नहीं है, बल्कि यदि इससे उसकी धार्मिक आस्था प्रभावित होती है तो यह मानसिक और भावनात्मक क्षति का भी विषय बन जाता है। आयोग ने अपने आदेश में कहा कि कंपनी की लापरवाही के कारण शिकायतकर्ता को आर्थिक, मानसिक और धार्मिक नुकसान हुआ, इसलिए उसे 70 हजार रुपये का मुआवजा दिया जाना चाहिए।
ये दोनों घटनाएं ऐसे समय सामने आई हैं जब देश में खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता, लेबलिंग और विज्ञापन दावों को लेकर निगरानी लगातार बढ़ रही है। FSSAI समय-समय पर कंपनियों को भ्रामक दावों से बचने और उपभोक्ताओं को सही जानकारी देने के निर्देश देता रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्पादों पर किए गए दावे पूरी तरह वैज्ञानिक और नियमों के अनुरूप होने चाहिए, ताकि ग्राहक किसी भी तरह के भ्रम का शिकार न हों।
अब सबकी नजर डाबर इंडिया पर है कि कंपनी FSSAI के निर्देशों का पालन करते हुए अपने उत्पादों की पैकेजिंग और प्रचार सामग्री में क्या बदलाव करती है। वहीं उपभोक्ता आयोग का फैसला भी कंपनियों के लिए एक संदेश माना जा रहा है कि गुणवत्ता और उपभोक्ताओं की भावनाओं से जुड़ी लापरवाही पर सख्त कार्रवाई हो सकती है।



