
Indian Politics 100 Years: भारत की लोकतांत्रिक राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के दौर से गुजरती दिख रही है। हाल के चुनावी नतीजों के बाद यह बहस तेज हो गई है कि क्या देश में अब विचारधारा का केंद्र पूरी तरह बदल चुका है—जहाँ एक ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी सोच का प्रभाव बढ़ता दिख रहा है, वहीं वामपंथी राजनीति सिमटती नजर आ रही है।
हालांकि “उन्मूलन” जैसे शब्दों का इस्तेमाल सावधानी से किया जाना चाहिए। इतिहास गवाह है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) और वामपंथी विचारधारा ने भारत की राजनीति और नीतियों को गहराई से प्रभावित किया है—चाहे वह 1957 में केरल की पहली लोकतांत्रिक कम्युनिस्ट सरकार हो या भूमि सुधार जैसे बड़े कदम।
नक्सलवाद पर सरकार के कड़े रुख और अमित शाह द्वारा संसद में की गई घोषणाओं के बाद यह जरूर कहा जा रहा है कि देश इस चुनौती से काफी हद तक बाहर आया है। लेकिन यह भी सच है कि नक्सलवाद सिर्फ सुरक्षा का नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक असंतुलन का भी मुद्दा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत पकड़ बनाई है, जिससे विचारधारात्मक ध्रुवीकरण बढ़ा है। इसके समानांतर, वामपंथ और अन्य क्षेत्रीय दलों को अपने अस्तित्व और प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिए नए राजनीतिक नैरेटिव की तलाश करनी पड़ रही है।
दक्षिण और पूर्व भारत के संदर्भ में भी तस्वीर इतनी सरल नहीं है। एम.के. स्टालिन जैसे नेता अभी भी अपने राज्यों में मजबूत पकड़ रखते हैं, और केरल जैसे राज्यों में वामपंथी राजनीति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।



