
लखनऊ। राजधानी लखनऊ के कांशीराम स्मृति स्थल पर 11 मार्च को आयोजित ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के “धर्मयुद्ध शंखनाद” कार्यक्रम में अपेक्षित जनसमर्थन नहीं जुट सका। गोरक्षा के मुद्दे पर बड़े आंदोलन की घोषणा के बावजूद सभा में भीड़ सीमित रही, जिससे इस पहल की प्रभावशीलता पर सवाल उठने लगे हैं।
कार्यक्रम के दौरान शंकराचार्य ने 3 मई से गोरखपुर से 81 दिन की “गविष्ठी यात्रा” निकालने की घोषणा की। इस यात्रा के माध्यम से वे गोरक्षा और गाय को “राष्ट्र माता” का दर्जा देने की मांग को लेकर प्रदेशभर में जनजागरण करने की बात कह रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में गोरक्षा पहले से ही एक प्रमुख राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा है। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राज्य सरकार अवैध बूचड़खानों पर कार्रवाई, गोशालाओं के विकास और गौ संरक्षण से जुड़ी कई योजनाएं लागू कर चुकी है। ऐसे में इसी मुद्दे पर सरकार के खिलाफ व्यापक जनआंदोलन खड़ा करना आसान नहीं माना जा रहा।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब सत्ता में पहले से ही हिंदुत्व और गोरक्षा के एजेंडे पर काम करने वाली सरकार हो, तो उसी मुद्दे को लेकर उसके खिलाफ बड़ा जनसमर्थन जुटाना स्वाभाविक रूप से चुनौतीपूर्ण हो जाता है। यही कारण रहा कि लखनऊ में आयोजित कार्यक्रम अपेक्षित उत्साह पैदा नहीं कर सका।
इस कार्यक्रम में विपक्षी दलों के कुछ नेताओं की मौजूदगी ने इसे राजनीतिक रंग भी दे दिया। अखिलेश यादव द्वारा शंकराचार्य से मुलाकात और कुछ विपक्षी नेताओं की उपस्थिति के बाद भाजपा समर्थक इसे विपक्ष के समर्थन से जोड़कर देख रहे हैं।
हालांकि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने आंदोलन को धार्मिक और सामाजिक बताते हुए कहा कि संतों का कर्तव्य सत्ता को सही मार्ग दिखाना होता है। वहीं प्रशासन का कहना है कि कार्यक्रम को सामान्य शर्तों के साथ अनुमति दी गई थी ताकि कानून-व्यवस्था बनी रहे।
अब सबकी नजर मई में शुरू होने वाली “गविष्ठी यात्रा” पर है, जिससे यह तय होगा कि यह अभियान प्रदेश में कितना व्यापक जनसमर्थन जुटा पाता है।



