
नई दिल्ली। Supreme Court of India ने देशभर की ओपन और सेमी-ओपन जेलों (ओपन करेक्शनल इंस्टीट्यूशंस) के संचालन और सुधार को लेकर अहम दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को तीन महीने के भीतर स्पष्ट प्रोटोकॉल तैयार करने और दो महीने में पात्रता व सुरक्षा मानकों के तहत खाली पद भरने का आदेश दिया है।
यह निर्देश जेलों में भीड़भाड़ और खुले सुधार गृहों की स्थिति से जुड़ी एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दिया गया।
सिर्फ कैद नहीं, सुधार और पुनर्वास का केंद्र बनें ओपन जेल
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ओपन करेक्शनल इंस्टीट्यूशंस केवल कैदियों को रखने की जगह नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास के प्रभावी संस्थान होने चाहिए।
ओपन या सेमी-ओपन जेलों में कैदियों को दिन में काम करने और शाम को जेल लौटने की अनुमति होती है। इसका उद्देश्य उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़े रखना और मानसिक दबाव कम करना है।
राज्यों को तीन महीने में बनाना होगा प्रोटोकॉल
अदालत ने आदेश दिया कि सभी राज्य और केंद्रशासित प्रदेश तीन महीने में समयबद्ध प्रोटोकॉल तैयार करें। पात्रता और सुरक्षा नियमों के तहत दो महीने में खाली पदों को भरा जाए। प्रोटोकॉल और पदपूर्ति की रिपोर्ट एक महीने के भीतर निगरानी समिति को सौंपी जाए। नई ओपन जेलें स्थापित करने और बंद जेलों में ओपन/सेमी-ओपन बैरक्स बनाने पर ठोस कदम उठाए जाएं। तीन महीने में जेल संरचना का समग्र मूल्यांकन किया जाए।
महिलाओं के लिए पर्याप्त व्यवस्था का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से निर्देश दिया कि महिला कैदियों के लिए पर्याप्त क्षमता और सुविधाएं सुनिश्चित करने हेतु ओपन करेक्शनल इंस्टीट्यूशंस का पुनर्गठन किया जाए।
जेलें केवल सजा का माध्यम नहीं: सुप्रीम कोर्ट
न्यायमूर्ति Vikram Nath और न्यायमूर्ति Sandeep Mehta की पीठ ने कहा कि जेलें केवल दंड का स्थान नहीं हैं। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का हवाला देते हुए कहा कि कैदी भी समानता, गैर-भेदभाव और गरिमा के अधिकार से वंचित नहीं किए जा सकते। उनके साथ मानवीय व्यवहार किया जाना अनिवार्य है।
उच्च स्तरीय समिति का गठन
ओपन जेलों के सुधार और संचालन के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक उच्च स्तरीय समिति गठित की है। इसके कार्यकारी अध्यक्ष पूर्व न्यायाधीश S. Ravindra Bhat होंगे।
यह समिति ओपन करेक्शनल इंस्टीट्यूशंस के संचालन, प्रशासन, पात्रता और रहने की स्थिति के लिए समान न्यूनतम मानक तय करेगी। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सभी उच्च न्यायालयों को सुवो मोटु याचिका दर्ज कर आदेश के पालन की निगरानी करने का निर्देश दिया है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
देश की जेलों में बढ़ती भीड़ और संसाधनों की कमी लंबे समय से चिंता का विषय रही है। ऐसे में यह फैसला सुधारात्मक न्याय प्रणाली (Reformative Justice System) को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान की मजबूती सजा की कठोरता में नहीं, बल्कि कैदियों की गरिमा, आशा और अवसर की पुनर्स्थापना में निहित है।



