Jantar Mantar Protest: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, प्रदर्शन की जांच के लिए बनेगी हाई-पावर्ड कमेटी

जंतर-मंतर पर छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई के आरोपों की जांच होगी। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की अध्यक्षता में कमेटी बनाने की बात कही गई है।

Jantar Mantar Protest: जंतर-मंतर पर छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बड़ा कदम उठाया। अदालत ने कहा कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई और उससे जुड़े अन्य आरोपों की जांच के लिए एक हाई-पावर्ड कमेटी का गठन किया जाएगा। इस कमेटी की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व जज करेंगे।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने संकेत दिया कि कमेटी पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र तरीके से जांच करेगी। इसमें हाई कोर्ट के एक पूर्व जज और एक रिटायर्ड डायरेक्टर जनरल को भी सदस्य के तौर पर शामिल किया जाएगा। कमेटी के गठन का उद्देश्य प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं और पुलिस की कार्रवाई से जुड़े आरोपों की वास्तविक स्थिति सामने लाना है।

जंतर-मंतर पर छात्र प्रदर्शन को लेकर पहले से ही विवाद चल रहा है। प्रदर्शनकारियों की ओर से आरोप लगाए गए थे कि पुलिस ने उन्हें नियंत्रित करने के लिए जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल किया। प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों के साथ कथित दुर्व्यवहार और चोट लगने के आरोप भी सामने आए थे। इन्हीं आरोपों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गई थीं।

सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस ने अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज किया। पुलिस की ओर से अदालत में दाखिल हलफनामे में कहा गया कि प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए जवानों ने केवल उतना ही बल इस्तेमाल किया, जितना जरूरी था। पुलिस ने यह भी दावा किया कि उसके जवानों ने पूरे घटनाक्रम के दौरान काफी संयम बरता।

दिल्ली पुलिस के मुताबिक, हालात उस समय बिगड़े जब प्रदर्शनकारियों का एक समूह कथित तौर पर हिंसक हो गया। पुलिस ने दावा किया कि संसद की ओर मार्च करने की कोशिश के दौरान प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड्स की कई परतें तोड़ दी थीं। पुलिस का कहना है कि इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए बल का इस्तेमाल करना जरूरी हो गया था।

पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में लाठियों में कील लगाए जाने के आरोपों पर भी अपना पक्ष रखा। पुलिस के मुताबिक, इस आरोप के समर्थन में जिस वीडियो का हवाला दिया गया, वह केवल एक वीडियो था। पुलिस ने दावा किया कि वीडियो में दिखाई देने वाली वस्तु को गलत तरीके से कील लगी लाठी बताया गया।

पुलिस का कहना है कि वीडियो में नजर आ रही चीज वास्तव में राष्ट्रीय ध्वज वाली एक लाठी थी और संभव है कि उसे किसी प्रदर्शनकारी ने पकड़ा हुआ था। पुलिस ने यह भी कहा कि प्रदर्शनकारियों को कील लगी लाठियों से चोट पहुंचने की बात साबित करने वाला कोई मेडिकल सबूत सामने नहीं आया है।

दूसरी तरफ, प्रदर्शनकारियों से जुड़े पक्ष ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल किया गया और कुछ प्रदर्शनकारियों के साथ कथित तौर पर अनुचित व्यवहार किया गया। अब सुप्रीम कोर्ट की ओर से प्रस्तावित हाई-पावर्ड कमेटी इन आरोपों की जांच करेगी।

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कमेटी में न्यायिक और प्रशासनिक अनुभव रखने वाले लोगों को शामिल किए जाने की बात कही गई है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की अध्यक्षता में होने वाली यह कमेटी घटनाक्रम से जुड़े अलग-अलग पहलुओं को देख सकती है। इसमें पुलिस की कार्रवाई, प्रदर्शन की स्थिति, बैरिकेड तोड़े जाने की घटना और प्रदर्शनकारियों द्वारा लगाए गए आरोप जैसे मुद्दे शामिल हो सकते हैं।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी दोनों महत्वपूर्ण हैं। प्रदर्शन के दौरान पुलिस को स्थिति नियंत्रित करनी होती है, लेकिन बल प्रयोग को लेकर भी स्पष्ट नियम और जवाबदेही जरूरी होती है।

अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित की जाने वाली हाई-पावर्ड कमेटी पर रहेगी। कमेटी की जांच से यह स्पष्ट होने में मदद मिल सकती है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान वास्तव में क्या हुआ था और पुलिस ने जिस तरह की कार्रवाई की, वह परिस्थितियों के हिसाब से उचित थी या नहीं।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के इस कदम के बाद जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़े मामले में आगे की जांच का रास्ता साफ हो गया है। कमेटी के गठन और उसकी जांच के बाद ही पूरे घटनाक्रम को लेकर स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।

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