
UP Politics: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले ब्राह्मण वोट एक बार फिर प्रदेश की सियासत के केंद्र में आता दिख रहा है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती दोनों की नजर इस महत्वपूर्ण सामाजिक वर्ग पर है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या ब्राह्मण मतदाताओं के बीच बीजेपी की पकड़ को कमजोर करने के लिए विपक्षी दल नई रणनीति तैयार कर रहे हैं?
अखिलेश यादव ने जनेश्वर मिश्र की जयंती पर आयोजित प्रबुद्ध सम्मेलन में ब्राह्मण समाज को लेकर बड़ा सियासी संदेश दिया। उन्होंने PDA की अपनी राजनीति में ‘P’ को पंडित बताते हुए कहा कि सपा के एजेंडे में पंडित भी शामिल हैं। इसके साथ ही उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी की विरासत और कानपुर के विकास दुबे एनकाउंटर जैसे मुद्दों का जिक्र कर बीजेपी पर निशाना साधा।
यूपी में क्यों अहम है ब्राह्मण वोट?
उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में ब्राह्मण मतदाताओं को प्रभावशाली वर्ग माना जाता है। अलग-अलग आकलनों में प्रदेश में उनकी आबादी करीब 12 से 14 प्रतिशत के बीच बताई जाती है। माना जाता है कि राज्य की बड़ी संख्या में विधानसभा सीटों पर यह समुदाय चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में है।
यही वजह है कि चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक दल ब्राह्मण समाज को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते रहे हैं। पिछले कुछ दशकों में बीजेपी, बसपा और सपा तीनों ने अलग-अलग समय पर इस वर्ग को साधने की रणनीति अपनाई है।
बीजेपी से नाराजगी की चर्चा के बीच अखिलेश की कोशिश
हाल के महीनों में ब्राह्मण समाज के एक हिस्से की बीजेपी से नाराजगी को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हुई हैं। UGC गाइडलाइन, ट्रांसफर-पोस्टिंग और संगठन में प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर असंतोष की बातें सामने आती रही हैं। बिहार में भरत तिवारी के पुलिस एनकाउंटर को लेकर भी ब्राह्मण समाज में नाराजगी की चर्चा हुई।
इसी राजनीतिक माहौल को अखिलेश यादव अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं। अयोध्या से पूर्व मंत्री पवन पांडेय को प्रत्याशी घोषित करना भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक बीजेपी से ब्राह्मण वोट का बड़ा हिस्सा अलग करना सपा के लिए आसान चुनौती नहीं होगी।
बीजेपी के साथ क्यों रहा ब्राह्मण समाज?
1990 के दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में ब्राह्मण मतदाता बीजेपी के साथ आए। इसके बाद हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की राजनीति बीजेपी के लिए इस वर्ग को जोड़ने का प्रमुख आधार बनी।
2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने बड़ी संख्या में ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया था। इनमें कई उम्मीदवार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। 2022 में भी बीजेपी के टिकट पर बड़ी संख्या में ब्राह्मण विधायक चुने गए। योगी आदित्यनाथ की हिंदुत्व और कानून-व्यवस्था की छवि को भी बीजेपी के समर्थन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है।
मायावती भी ब्राह्मण कार्ड खेलने में पीछे नहीं
ब्राह्मण वोट को लेकर मायावती की रणनीति भी पुरानी है। 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने दलित-ब्राह्मण सामाजिक समीकरण पर जोर दिया था। पार्टी ने बड़ी संख्या में ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया और पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई।
बसपा ने उस समय ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ का नारा दिया और सतीश चंद्र मिश्र जैसे ब्राह्मण नेताओं को प्रमुख भूमिका दी। अब 2027 के चुनाव से पहले मायावती फिर ब्राह्मण समाज को साधने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने शुरुआती उम्मीदवारों में भी ब्राह्मण चेहरों को जगह दी है।
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अखिलेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या?
अखिलेश यादव के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सपा के पारंपरिक यादव-मुस्लिम समीकरण के साथ ब्राह्मण मतदाता भी सहजता से जुड़ पाएंगे। सपा को एक तरफ ब्राह्मणों को भरोसा दिलाना होगा, वहीं दूसरी तरफ अपने पारंपरिक वोट बैंक के बीच संतुलन भी बनाए रखना होगा।
दूसरी चुनौती हिंदुत्व के मुद्दे की है। बीजेपी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राजनीति में हिंदुत्व और राष्ट्रवाद प्रमुख मुद्दे रहे हैं। ऐसे में सपा अगर ब्राह्मणों को साधने के लिए बहुत ज्यादा हिंदुत्व विरोधी रुख अपनाती है तो उसके सामने राजनीतिक संतुलन की समस्या खड़ी हो सकती है।
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ब्राह्मणों को लेकर अखिलेश यादव और मायावती की सक्रियता ने यूपी की सियासत में नई चर्चा जरूर छेड़ दी है। अब देखना होगा कि यह रणनीति सिर्फ राजनीतिक संदेश तक सीमित रहती है या वास्तव में ब्राह्मण मतदाताओं के बीच विपक्ष को चुनावी फायदा दिला पाती है।



