
Sonbhadra News-इतिहास के पन्नों में कुछ नाम बड़े अक्षरों में नहीं लिखे जाते, फिर भी समय की हर करवट पर उनका प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। ऐसे ही मौन तपस्वी, कर्मयोगी और राष्ट्रनिष्ठ व्यक्तित्व थे जय प्रकाश चतुर्वेदी।
आज वे हमारे बीच भौतिक रूप से नहीं हैं। उनका निधन केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि एक ऐसे युग का अवसान है जिसने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र, समाज और संगठन के लिए समर्पित कर दिया। उनके जाने से केवल परिवार ही नहीं, बल्कि हजारों कार्यकर्ता, ग्रामीण और शुभचिंतक शोकाकुल हैं जिनके जीवन में उन्होंने सेवा, संस्कार और विकास का दीप प्रज्वलित किया।
गाँव की पगडंडियों से संगठन तक की यात्रा
स्वतंत्र भारत के आरंभिक वर्षों में सोनभद्र के सुदूर ग्राम चांची कलां में श्री रामाधार चतुर्वेदी एवं श्रीमती राजवंशी देवी के घर जन्मे जय प्रकाश चतुर्वेदी ने बचपन से ही अभावों को अपना साथी बनाया। रायबरेली में शिक्षा के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़कर उन्होंने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं का त्याग कर स्वयं को पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में राष्ट्र को समर्पित कर दिया।
आपातकाल का अंधकार हो या राम जन्मभूमि आंदोलन का संघर्षपूर्ण काल – वे सदैव अग्रिम पंक्ति में रहे। जिला प्रचारक, विभाग प्रचारक, प्रांत प्रचारक तथा विद्या भारती में संगठन मंत्री जैसे दायित्वों का निर्वहन करते हुए उन्होंने अनगिनत कार्यकर्ताओं का निर्माण किया।
बाद में संघ ने उन्हें भाजपा में संगठन मंत्री का दायित्व सौंपा। उस समय जब भाजपा आज जैसी विशाल शक्ति नहीं थी, उन्होंने गाँव-गाँव संगठन खड़ा किया। उत्तर प्रदेश में भाजपा के विस्तार तथा स्वर्गीय कल्याण सिंह के नेतृत्व में सरकार बनने की पृष्ठभूमि तैयार करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी का उन पर विशेष विश्वास उनके व्यक्तित्व की विश्वसनीयता का प्रमाण था।
“सबसे बड़ी उपलब्धि – मातृभूमि के प्रति प्रेम”
यदि उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि पूछी जाए तो वह राजनीति नहीं, बल्कि अपनी मातृभूमि के प्रति अटूट प्रेम है।
जिस क्षेत्र में कभी पीने के पानी तक का संकट था, वहाँ उनके प्रयासों से हैंडपंप लगे, सड़कें बनीं, मंदिरों का निर्माण हुआ और कल्याण मंडप बने।
कोन क्षेत्र को राष्ट्रीय राजमार्ग से जोड़ने वाले कनहर नदी के पुल की घोषणा भी उनके प्रयासों से तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह द्वारा उसी मंच से हुई थी। यह केवल पुल नहीं, पूरे क्षेत्र के विकास का सेतु बना।
वर्ष 2004 में अटल जी के विश्वास के कारण उन्हें उत्तर प्रदेश विधान परिषद का सदस्य बनाया गया। पर पद का अहंकार कभी उन पर हावी नहीं हुआ। वे अंतिम समय तक स्वयं को कार्यकर्ता ही मानते रहे।
“संगठन तप, त्याग और सेवा से खड़े होते हैं”
जय प्रकाश चतुर्वेदी का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि संगठन भवनों से नहीं, तप, त्याग, अनुशासन और निस्वार्थ सेवा से खड़े होते हैं। उन्होंने सत्ता नहीं, संस्कार कमाए; पद नहीं, विश्वास अर्जित किया।
आज सोनभद्र ही नहीं, पूरा उत्तर प्रदेश अपने इस कर्मयोगी को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है। उनका जाना एक ऐसी रिक्तता छोड़ गया है जिसे भर पाना कठिन होगा। किंतु उनके आदर्श और उनके द्वारा तैयार की गई कार्यकर्ताओं की पीढ़ियाँ सदैव उन्हें जीवित रखेंगी।
कुछ लोग केवल जीवन जीते हैं, लेकिन कुछ लोग स्वयं एक युग बन जाते हैं। जय प्रकाश चतुर्वेदी ऐसा ही एक युग थे।
ईश्वर दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें।
अमित मिश्रा, रिपोर्ट -सोनभद्र



