
UP Panchayat News: उत्तर प्रदेश में पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर योगी सरकार की नई रणनीति राजनीतिक बहस का विषय बन गई है। सरकार ग्राम प्रधानों के बाद अब जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लॉक प्रमुखों को भी अंतरिम अवधि के लिए प्रशासक नियुक्त करने की तैयारी में है। प्रस्ताव मुख्यमंत्री की मंजूरी के लिए भेजा गया है। सरकार इसे प्रशासनिक निरंतरता का कदम बता रही है, जबकि विपक्ष इसे 2027 विधानसभा चुनाव से पहले की राजनीतिक रणनीति करार दे रहा है।
11 जुलाई से खत्म होगा कार्यकाल
प्रदेश में 11 जुलाई से 75 जिला पंचायत अध्यक्षों और 800 से अधिक ब्लॉक प्रमुखों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। अब तक ऐसी स्थिति में जिला पंचायतों का संचालन जिलाधिकारी और क्षेत्र पंचायतों का कामकाज उपजिलाधिकारी प्रशासक के रूप में संभालते रहे हैं। लेकिन इस बार सरकार निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को ही अगले छह महीने तक प्रशासक बनाए रखने की तैयारी में है।
इससे पहले मई में करीब 57 हजार ग्राम प्रधानों को भी इसी व्यवस्था के तहत प्रशासक नियुक्त किया गया था।
सरकार ने बताई यह वजह
पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर के अनुसार, इस संबंध में जल्द शासनादेश जारी किया जा सकता है। सरकार का कहना है कि पंचायत चुनाव से पहले आरक्षण निर्धारण, मतदाता सूची का पुनरीक्षण और अन्य कानूनी प्रक्रियाएं पूरी होनी हैं। ऐसे में निर्वाचित प्रतिनिधियों को प्रशासक बनाए रखने से विकास कार्यों की निरंतरता बनी रहेगी और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में बाधा नहीं आएगी।
हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी नजर
ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने के फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल उठाया कि पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा होने के बाद क्या उसी निर्वाचित प्रतिनिधि को प्रशासक के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई को होनी है।
माना जा रहा है कि हाईकोर्ट का फैसला जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लॉक प्रमुखों की प्रस्तावित नियुक्ति पर भी असर डाल सकता है।
2027 चुनाव से जोड़कर देख रहा विपक्ष
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पंचायत प्रतिनिधि ग्रामीण क्षेत्रों में राजनीतिक संगठन की अहम कड़ी होते हैं। ऐसे में उन्हें पद पर बनाए रखने से सत्तारूढ़ दल का स्थानीय नेटवर्क सक्रिय रह सकता है, जिसका लाभ 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों में मिल सकता है।
वहीं समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने इस प्रस्ताव का विरोध किया है। विपक्ष का कहना है कि पंचायतों का संवैधानिक कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हीं निर्वाचित प्रतिनिधियों को दूसरे नाम से पद पर बनाए रखना संविधान की भावना के विपरीत है। उनका तर्क है कि अंतरिम व्यवस्था प्रशासनिक अधिकारियों के माध्यम से ही संचालित होनी चाहिए।



