International News: 132 साल पुरानी डुरंड लाइन: एक लकीर जिसने दो देशों और एक समुदाय को बांट दिया

1893 में खींची गई लकीर ने पश्तून समुदाय को बांटा, आज भी सीमा विवाद और झड़पों की बड़ी वजह

International News:  पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जब भी तनाव बढ़ता है, एक नाम बार-बार सुर्खियों में आ जाता है — Durand Line। यह सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं, बल्कि इतिहास, राजनीति और पहचान से जुड़ा ऐसा मुद्दा है, जिसने पिछले 132 वर्षों से क्षेत्रीय समीकरणों को प्रभावित किया है।

कैसे खींची गई यह सीमा?

डुरंड लाइन की शुरुआत साल 1893 में हुई थी। उस समय ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव Mortimer Durand और अफगान अमीर अब्दुर रहमान खान के बीच एक समझौता हुआ। इस समझौते के तहत दोनों के प्रभाव क्षेत्रों को तय करने के लिए एक सीमा रेखा खींची गई।

उस दौर में यह ब्रिटिश साम्राज्य की रणनीतिक जरूरत थी, लेकिन शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह लकीर आने वाली सदियों तक विवाद का कारण बनेगी।

पश्तून समुदाय का बंटवारा

डुरंड लाइन का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि इसने पश्तून समुदाय को दो हिस्सों में बांट दिया। एक हिस्सा आज के पाकिस्तान में है, जबकि दूसरा अफगानिस्तान में।

अफगानिस्तान का तर्क है कि यह सीमा औपनिवेशिक दबाव में तय की गई थी और इसे स्थायी अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं माना जा सकता। दूसरी ओर पाकिस्तान इसे अपनी आधिकारिक और मान्य सीमा बताता है।

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आज क्यों है विवाद?

समय के साथ यह सीमा सिर्फ नक्शे की रेखा नहीं रही। सीमा पार आतंकवाद, तस्करी, उग्रवाद और सैन्य झड़पें अक्सर दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित करती रही हैं।

पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान ने डुरंड लाइन पर बाड़ लगाने की प्रक्रिया तेज की, जिसका अफगान पक्ष ने कई बार विरोध किया। जब भी सीमा पर गोलीबारी या हमलों की खबर आती है, डुरंड लाइन का मुद्दा फिर चर्चा में आ जाता है।

सिर्फ भू-राजनीति नहीं, पहचान का सवाल

डुरंड लाइन का विवाद केवल जमीन का नहीं है, बल्कि पहचान और इतिहास का भी है। ‘ग्रेटर पश्तूनिस्तान’ की अवधारणा समय-समय पर उठती रही है, जिसने इस मुद्दे को और जटिल बना दिया।

विशेषज्ञ मानते हैं कि जब तक दोनों देशों के बीच भरोसे और संवाद का मजबूत ढांचा नहीं बनता, यह सीमा तनाव की वजह बनी रह सकती है।

डुरंड लाइन 132 साल पुरानी जरूर है, लेकिन इसका असर आज भी उतना ही ताजा है। यह हमें याद दिलाती है कि औपनिवेशिक दौर में खींची गई सीमाएं केवल नक्शे नहीं बदलतीं, बल्कि लोगों की जिंदगी, पहचान और राजनीति को भी गहराई से प्रभावित करती हैं।

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच शांति और स्थिरता की राह शायद इसी इतिहास को समझने और संतुलित समाधान खोजने से होकर गुजरती है।

Written By: Anushri Yadav

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