
Singrauli News-देश की ऊर्जा राजधानी के रूप में पहचान रखने वाले सिंगरौली में कोयला कारोबार से जुड़ी गतिविधियों को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। इस बार चर्चा का केंद्र झारखंड से आने वाले कथित ‘इन्वर्ड रेलवे रैक’, गोरबी-महदेइया रेलवे क्षेत्र और महावीर कोल वॉशरी तक पहुंचने वाली सामग्री बनी हुई है।
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि झारखंड से कथित रूप से ‘रिजेक्ट कोल’ अथवा अन्य कोयला आधारित सामग्री रेलवे रैक के माध्यम से गोरबी-महदेइया क्षेत्र में पहुंचती है और इसके बाद उसे महावीर कोल वॉशरी तक ले जाया जाता है। इन चर्चाओं के साथ यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि ऐसी सामग्री का आगे कोयले के साथ उपयोग अथवा मिश्रण किया जाता है।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए किसी व्यक्ति, कंपनी, रेलवे अधिकारी, कर्मचारी अथवा सुरक्षा एजेंसी को केवल आरोपों के आधार पर दोषी मानना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि लगातार उठ रहे सवालों में तथ्य हैं तो उनका जवाब मौके के निरीक्षण से अधिक रेलवे रिकॉर्ड, वजन संबंधी दस्तावेज, स्टॉक रजिस्टर, परिवहन अभिलेख और वैज्ञानिक नमूना परीक्षण से सामने आ सकता है।
‘इन्वर्ड रैक’ की पूरी कहानी रिकॉर्ड में छिपी
किसी भी रेलवे रैक की आवाजाही के पीछे दस्तावेजी रिकॉर्ड मौजूद होता है। ऐसे में जांच की पहली कड़ी कथित रूप से झारखंड से आने वाले रैक के वास्तविक स्रोत और उसमें घोषित सामग्री से शुरू की जा सकती है।
जांच में यह देखा जाना जरूरी होगा कि—
- रैक किस लोडिंग स्टेशन से रवाना हुआ?
- रेलवे दस्तावेजों में सामग्री का नाम क्या दर्ज है?
- घोषित ग्रेड और मात्रा कितनी है?
- प्रत्येक वैगन का वजन कितना दर्ज है?
- गोरबी अथवा महदेइया में रैक कब पहुंचा?
- अनलोडिंग के समय कितना माल प्राप्त हुआ?
- अनलोडिंग के बाद सामग्री किस स्थान पर जमा की गई?
- वहां से किस वाहन के माध्यम से माल आगे भेजा गया?
- महावीर कोल वॉशरी के रिकॉर्ड में उसकी प्राप्ति किस रूप में दर्ज की गई?
इन सभी सवालों के जवाबों का आपस में मिलान किया जाए तो कथित आपूर्ति श्रृंखला की वास्तविक तस्वीर काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है।
गोरबी-महदेइया से वॉशरी तक की कड़ी सबसे महत्वपूर्ण
स्थानीय चर्चाओं में सबसे अहम सवाल यह है कि रेलवे रैक से उतरने के बाद सामग्री की वास्तविक आवाजाही किस तरह हुई।
यदि कोई सामग्री रेलवे साइडिंग पर उतरती है और उसके बाद सड़क मार्ग से किसी वॉशरी तक जाती है तो सामान्यतः उसके परिवहन से जुड़े कई दस्तावेज उपलब्ध होने चाहिए। इनमें वाहन नंबर, वजन पर्ची, परिवहन दस्तावेज, ई-वे बिल अथवा अन्य लागू अभिलेख, प्रवेश-निकास रिकॉर्ड और वॉशरी का प्राप्ति रजिस्टर महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
यही वजह है कि केवल रेलवे रैक की जांच पर्याप्त नहीं होगी। रैक से लेकर अंतिम प्राप्तकर्ता तक की पूरी लॉजिस्टिक चेन का मिलान आवश्यक होगा।
क्या ‘रिजेक्ट कोल’ और अन्य सामग्री की पहचान हुई?
स्थानीय स्तर पर ‘रिजेक्ट कोल’ को लेकर भी चर्चा है। ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि रेलवे दस्तावेजों में वास्तव में कौन-सी सामग्री दर्ज है और मौके पर प्राप्त सामग्री उसकी घोषित पहचान से मेल खाती है या नहीं।
यदि सामग्री की प्रकृति को लेकर संदेह है तो अधिकृत प्रक्रिया के तहत नमूने लिए जाने चाहिए। नमूने केवल एक स्थान से लेने के बजाय आवश्यकता के अनुसार अलग-अलग चरणों से लिए जा सकते हैं—
रेलवे अनलोडिंग प्वाइंट → स्टॉक यार्ड → परिवहन वाहन → वॉशरी प्राप्ति स्थल → डिस्पैच प्वाइंट।
इन सभी स्थानों से लिए गए नमूनों की तुलना प्रयोगशाला परीक्षण के माध्यम से की जा सकती है। प्रयोगशाला परिणामों को संबंधित दस्तावेजों से मिलाने पर यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि अलग-अलग चरणों में सामग्री की प्रकृति और गुणवत्ता में कोई महत्वपूर्ण अंतर है या नहीं।
‘छाई’ या किसी अन्य सामग्री की मिलावट के आरोप, वैज्ञानिक जांच जरूरी
स्थानीय स्तर पर कोयले में कथित रूप से छाई अथवा अन्य सामग्री मिलाने के आरोप भी सामने आए हैं। हालिया स्थानीय रिपोर्टों में महावीर कोल वॉशरी से जुड़े ऐसे आरोपों और निष्पक्ष जांच की मांग का उल्लेख किया गया है।
हालांकि किसी सामग्री को केवल देखकर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि वह छाई है अथवा किसी अन्य प्रकार की सामग्री। इसके लिए अधिकृत नमूना संग्रह और प्रयोगशाला परीक्षण ही निर्णायक आधार हो सकता है।
जांच के दौरान नमूना लेने की प्रक्रिया, सीलिंग, नमूना संख्या, संग्रह का स्थान और परीक्षण रिपोर्ट भी सुरक्षित रखी जानी चाहिए, ताकि बाद में सामने आने वाले किसी भी निष्कर्ष को दस्तावेजी रूप से सत्यापित किया जा सके।
रेलवे गुड्स एवं कॉमर्शियल विभाग की निगरानी भी जांच के दायरे में क्यों?
मामले में स्थानीय स्तर पर रेलवे के गुड्स एवं कॉमर्शियल विभाग तथा रेलवे सुरक्षा बल की निगरानी व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी अधिकारी या कर्मचारी की संलिप्तता की आधिकारिक पुष्टि वर्तमान में सामने नहीं आई है। इसलिए किसी व्यक्ति पर आरोप लगाने के बजाय जांच का विषय यह होना चाहिए कि संबंधित अवधि में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार क्या-क्या जांच और निगरानी की गई थी।
जांच में संबंधित अवधि के—
- ड्यूटी चार्ट,
- रैक आगमन एवं प्रस्थान रिकॉर्ड,
- गुड्स बुकिंग/डिलीवरी दस्तावेज,
- अनलोडिंग रिकॉर्ड,
- निरीक्षण रिपोर्ट,
- उपलब्ध CCTV फुटेज,
- शिकायत एवं चेकिंग रजिस्टर
का परीक्षण किया जा सकता है।
यदि निगरानी प्रक्रिया में कोई कमी सामने आती है तो उसकी प्रकृति और जिम्मेदारी दस्तावेजों के आधार पर निर्धारित की जा सकती है।
सवाल यह भी कि एक रैक या पूरी सप्लाई चेन?
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यदि कथित अनियमितता की पुष्टि होती है तो क्या यह किसी एक वाहन अथवा एक रेलवे रैक तक सीमित थी या ऐसी गतिविधि लगातार होती रही।
इसका उत्तर अनुमान से नहीं बल्कि तारीखवार रैक रिकॉर्ड और वाहन आवागमन के मिलान से मिल सकता है।
यदि पिछले कई महीनों के रैक रिकॉर्ड, संबंधित वाहनों के नंबर, वजन पर्चियों, वॉशरी के इनवर्ड रजिस्टर और डिस्पैच रिकॉर्ड का मिलान किया जाए तो यह स्पष्ट हो सकता है कि मामला किसी एक घटना तक सीमित था अथवा रिकॉर्ड में कोई व्यापक पैटर्न दिखाई देता है।
पर्यावरणीय प्रभाव का सवाल भी महत्वपूर्ण
स्थानीय लोगों द्वारा कथित ‘रिजेक्ट कोल’ अथवा कोयला आधारित सामग्री के भंडारण और परिवहन से धूल एवं प्रदूषण की समस्या की शिकायतें भी उठाई जा रही हैं।
ऐसे में जांच केवल कोयले की गुणवत्ता और आर्थिक लेनदेन तक सीमित न रहकर धूल नियंत्रण, भंडारण व्यवस्था, परिवहन के दौरान प्रदूषण नियंत्रण और आसपास के क्षेत्र पर संभावित पर्यावरणीय प्रभाव तक भी विस्तारित की जा सकती है।
यदि पर्यावरणीय मानकों के उल्लंघन की शिकायत है तो संबंधित सक्षम पर्यावरणीय प्राधिकरण द्वारा नियमानुसार निरीक्षण और आवश्यक नमूना परीक्षण कराया जाना भी महत्वपूर्ण होगा।
दस्तावेज बनाम आरोप—किसकी होगी जीत?
पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरोपों की पुष्टि अथवा खंडन दस्तावेज और वैज्ञानिक परीक्षण के आधार पर किया जाए।
जांच एजेंसी को एक साथ इन रिकॉर्डों का मिलान करना चाहिए—
रेलवे रैक रिकॉर्ड + RR/रेलवे दस्तावेज + वैगन वजन + अनलोडिंग रिकॉर्ड + स्टॉक रजिस्टर + वाहन नंबर + वजन पर्चियां + परिवहन दस्तावेज + वॉशरी इनवर्ड रजिस्टर + डिस्पैच रिकॉर्ड + CCTV फुटेज + प्रयोगशाला रिपोर्ट।
यदि सभी रिकॉर्ड एक-दूसरे से मेल खाते हैं तो उठ रहे सवालों का जवाब स्वतः मिल सकता है। वहीं यदि रिकॉर्ड में कोई अंतर सामने आता है तो उसी अंतर की आगे जांच की जा सकती है।
मुख्य सचिव से उच्चस्तरीय जांच की मांग
लगातार उठ रहे सवालों के बीच पर्यावरण क्षेत्र से जुड़े लोगों ने मध्यप्रदेश शासन के मुख्य सचिव का ध्यान आकृष्ट कराते हुए मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
मांग यह है कि जांच को किसी एक विभाग तक सीमित न रखा जाए, बल्कि रेलवे, जिला प्रशासन, खनिज, परिवहन, पर्यावरण तथा आवश्यकता के अनुसार अन्य संबंधित विभागों के उपलब्ध रिकॉर्ड का समन्वित परीक्षण कराया जाए।
इसके साथ ही झारखंड से आने वाले कथित इन्वर्ड रैक के स्रोत से लेकर गोरबी-महदेइया में अनलोडिंग और वहां से महावीर कोल वॉशरी तक पहुंचने वाली पूरी श्रृंखला का स्वतंत्र सत्यापन कराया जाए।
अब चार सवालों पर टिकी है पूरी जांच
सिंगरौली में उठ रही चर्चाओं के बीच अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल हैं—
पहला, क्या झारखंड से आने वाले कथित इन्वर्ड रेलवे रैक का स्रोत और घोषित सामग्री सार्वजनिक रिकॉर्ड के आधार पर सत्यापित होगी?
दूसरा, क्या गोरबी-महदेइया में अनलोडिंग से लेकर महावीर कोल वॉशरी तक पहुंचने वाली प्रत्येक खेप के वजन और दस्तावेजों का मिलान कराया जाएगा?
तीसरा, क्या कथित छाई/रिजेक्ट कोल के नमूनों की अधिकृत प्रयोगशाला से वैज्ञानिक जांच कराई जाएगी?
चौथा, क्या रेलवे, वॉशरी तथा परिवहन से जुड़े उपलब्ध रिकॉर्ड की स्वतंत्र उच्चस्तरीय जांच होगी?
फिलहाल पूरा मामला आरोप और चर्चाओं के स्तर पर है। किसी व्यक्ति या संस्था की जिम्मेदारी तभी तय हो सकती है जब सक्षम जांच में दस्तावेजी अथवा वैज्ञानिक साक्ष्य सामने आएं।
लेकिन एक बात स्पष्ट है—यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप है तो रिकॉर्ड और वैज्ञानिक जांच से तस्वीर साफ हो सकती है। वहीं यदि किसी स्तर पर अनियमितता मिलती है तो वही दस्तावेज आगे की कार्रवाई का आधार बन सकते हैं।
अब निगाह इस बात पर है कि झारखंड से आने वाले कथित ‘इन्वर्ड रेलवे रैक’ से लेकर गोरबी-महदेइया और महावीर कोल वॉशरी तक की पूरी कड़ी की जांच कब और किस स्तर पर होती है।
संजय द्विवेदी की खास रिपोर्ट



