
दिल्ली में पिछले कई दिनों से जारी CJP के प्रदर्शन को लेकर राजनीतिक बयानबाजी लगातार तेज होती जा रही है। अब शरद पवार गुट के सांसद अमर काले ने केंद्र सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि सरकार छात्रों की समस्याओं को सुनने के बजाय आंदोलन को नजरअंदाज कर रही है। उन्होंने कहा कि 22 दिनों से जारी प्रदर्शन इस बात का प्रमाण है कि सरकार संवाद स्थापित करने में पूरी तरह विफल रही है।
अमर काले ने कहा कि प्रदर्शन में शामिल छात्र शिक्षा व्यवस्था में सुधार, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और पेपर लीक जैसी घटनाओं पर सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। उनका आरोप है कि इतने लंबे समय तक आंदोलन जारी रहने के बावजूद सरकार का कोई वरिष्ठ प्रतिनिधि प्रदर्शनकारियों की समस्याएं सुनने नहीं पहुंचा।
उन्होंने पद्मश्री सम्मान से सम्मानित सोनम वांगचुक का भी उल्लेख करते हुए कहा कि वे आंदोलन के दौरान भूख हड़ताल पर बैठे रहे, लेकिन सरकार के किसी मंत्री या अधिकारी ने उनसे मुलाकात करने की जरूरत नहीं समझी। काले के मुताबिक यह सरकार की संवेदनहीनता को दर्शाता है।
सांसद ने पुलिस की कार्रवाई पर भी कड़ी नाराजगी जताई। उनका कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर लाठीचार्ज करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों की ओर से किसी प्रकार की हिंसा नहीं की गई थी, लेकिन पुलिस ने बल प्रयोग कर स्थिति को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया।
अमर काले ने कहा कि छात्रों पर हुई कार्रवाई से देश की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी नकारात्मक असर पड़ता है। उनका मानना है कि लोकतांत्रिक देश में अपनी मांगों को शांतिपूर्ण तरीके से उठाने वाले लोगों के साथ संवाद किया जाना चाहिए, न कि बल प्रयोग।
उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था से जुड़े विवादों का जिक्र करते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी दोहराई। काले का कहना है कि लगातार सामने आ रहे पेपर लीक मामलों और छात्रों में बढ़ते असंतोष की नैतिक जिम्मेदारी शिक्षा मंत्री को लेनी चाहिए।
सरकार पर हमला बोलते हुए अमर काले ने कहा कि मौजूदा रवैया लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जनता की आवाज सुनने के बजाय विरोध प्रदर्शनों को दबाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की कार्यशैली से लोगों का लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास कमजोर हो सकता है।
अपने बयान में उन्होंने सरकार की तुलना ब्रिटिश शासन की कार्यप्रणाली से करते हुए कहा कि आज जिस तरह विरोध की आवाजों के साथ व्यवहार किया जा रहा है, वह बेहद चिंताजनक है। हालांकि यह उनकी राजनीतिक टिप्पणी है, जिस पर सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
अमर काले ने विश्वास जताया कि लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता करती है और आने वाले चुनावों में मतदाता सरकार के कामकाज का जवाब देंगे। उनके अनुसार शिक्षा, युवाओं और रोजगार जैसे मुद्दों पर सरकार की नीतियां चुनावी राजनीति का बड़ा विषय बन सकती हैं।
फिलहाल CJP का प्रदर्शन जारी है और प्रदर्शनकारी अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। दूसरी ओर सरकार की ओर से अब तक इन मांगों पर कोई अंतिम फैसला घोषित नहीं किया गया है। ऐसे में आने वाले दिनों में सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ती है, इस पर सभी की नजर बनी हुई है।



