राम मंदिर की जमीन का होगा सर्वे? सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल, 2019 के फैसले वाली भूमि की जांच की मांग

अयोध्या में राम मंदिर की जमीन की सीमाएं और पुराने दस्तावेज जांचने के लिए स्वतंत्र आयोग बनाने की मांग, चढ़ावे का डिजिटल रिकॉर्ड और CAG ऑडिट कराने की भी मांग

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद अब उसकी जमीन की सीमाओं और दस्तावेजों की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट में नई याचिका दाखिल की गई है। याचिका में मांग की गई है कि एक स्वतंत्र समिति या आयोग गठित कर यह पता लगाया जाए कि मंदिर का निर्माण उसी भूमि पर हुआ है या नहीं, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर 2019 के फैसले में राम मंदिर निर्माण के लिए निर्धारित किया था। इसके साथ ही मंदिर में आने वाले दान और चढ़ावे का हिसाब सार्वजनिक करने तथा खातों का कैग से ऑडिट कराने की मांग भी उठाई गई है।

याचिकाकर्ता ने अदालत से जमीन का स्वतंत्र सर्वे कराने और मंदिर परिसर से जुड़े मूल दस्तावेजों को सुरक्षित रखने के निर्देश देने का अनुरोध किया है। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध वाद सूची के अनुसार, इस याचिका पर 2 नवंबर 2026 को सुनवाई हो सकती है।

राम मंदिर की जमीन की सीमाएं तय करने की मांग

याचिका में कहा गया है कि अयोध्या में राम मंदिर जिस जमीन पर बनाया गया है, उसकी सही पहचान और सीमाओं का स्वतंत्र रूप से सत्यापन कराया जाना चाहिए। इसके लिए पुराने नक्शों, राजस्व रिकॉर्ड, जमीन के भौगोलिक निर्देशांकों, क्षेत्रफल और मौजूदा स्थिति की जांच कराने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ता चाहता है कि सुप्रीम कोर्ट एक ऐसी विशेषज्ञ समिति या आयोग बनाए, जिसमें भूमि सर्वेक्षण, राजस्व विभाग और पुरातत्व सहित तकनीकी क्षेत्रों के जानकार शामिल हों। यह समिति उपलब्ध दस्तावेजों और जमीन की वास्तविक स्थिति का मिलान करके पता लगाए कि मंदिर का निर्माण उसी भूमि पर हुआ है या नहीं, जिसका उल्लेख सुप्रीम कोर्ट के 2019 के फैसले में किया गया था।

जमीन में अंतर मिला तो उचित निर्देश देने की मांग

याचिका में यह भी कहा गया है कि अगर जांच के दौरान फैसले में निर्धारित भूमि और मंदिर निर्माण वाली जमीन के बीच कोई बड़ा अंतर सामने आता है, तो उसे दूर करने के लिए अदालत उचित निर्देश जारी करे।

इसके लिए संबंधित अधिकारियों और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जमीन की पहचान, सीमांकन और मंदिर निर्माण से जुड़े सभी मूल दस्तावेज सुरक्षित रखने की मांग की गई है। इसमें पुराने नक्शे, निर्माण योजनाएं और सर्वे से संबंधित रिकॉर्ड भी शामिल हैं। याचिकाकर्ता चाहता है कि जरूरत पड़ने पर ये सभी दस्तावेज अदालत के सामने प्रस्तुत किए जाएं।

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि फिलहाल ये याचिकाकर्ता की मांगें हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अभी न तो जमीन के सर्वे का आदेश दिया है और न ही मंदिर की जमीन को लेकर किसी गड़बड़ी की पुष्टि की है।

मंदिर में चढ़ावे का डिजिटल रिकॉर्ड और CAG ऑडिट कराने की मांग

याचिका में केवल जमीन के सर्वे का मुद्दा ही नहीं उठाया गया है, बल्कि मंदिर में आने वाले दान और चढ़ावे के हिसाब-किताब को पारदर्शी बनाने की मांग भी की गई है।

याचिकाकर्ता के मुताबिक, मंदिर में देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए बेहतर सुविधाएं विकसित की जानी चाहिए। इसके साथ ही मंदिर में मिलने वाले दान, चढ़ावे और रसीदों का रोजाना डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाए और उसका विवरण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाए।

याचिका में मंदिर से जुड़े खातों का हर साल नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG से ऑडिट कराने का अनुरोध भी किया गया है। इसके पीछे दान में मिलने वाली रकम के इस्तेमाल में पारदर्शिता बनाए रखने और वित्तीय रिकॉर्ड की नियमित जांच सुनिश्चित करने की बात कही गई है।

2 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में हो सकती है सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध वाद सूची के मुताबिक, यह याचिका 2 नवंबर 2026 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है। मामले पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ सुनवाई कर सकती है।

अब इस मामले में अदालत के रुख पर नजर रहेगी। खास तौर पर यह देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट जमीन के स्वतंत्र सर्वे, पुराने दस्तावेजों की जांच और मंदिर के चढ़ावे के ऑडिट से जुड़ी मांगों पर क्या फैसला लेता है। फिलहाल याचिका पर सुनवाई होनी बाकी है।

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2019 में सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था ऐतिहासिक फैसला

अयोध्या में राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद को लेकर विवाद लंबे समय तक अदालतों में चला था। विवादित स्थल पर बनी 16वीं सदी की बाबरी मस्जिद को 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने गिरा दिया था। इसके बाद देश के कई हिस्सों में सांप्रदायिक तनाव और दंगे हुए थे।

इस जमीन को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2010 में फैसला सुनाते हुए विवादित 2.77 एकड़ भूमि को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच बराबर बांटने का आदेश दिया था। इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 14 अपीलें दाखिल की गई थीं।

इन अपीलों पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 9 नवंबर 2019 को सर्वसम्मति से फैसला सुनाया। अदालत ने विवादित जमीन राम मंदिर निर्माण के लिए गठित ट्रस्ट को सौंपने का रास्ता साफ किया था। साथ ही सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद निर्माण के लिए अयोध्या में पांच एकड़ वैकल्पिक जमीन देने का निर्देश केंद्र सरकार को दिया था।

अब नई याचिका के जरिए 2019 के फैसले में निर्धारित भूमि की पहचान, मंदिर परिसर के रिकॉर्ड और चढ़ावे के हिसाब-किताब की जांच कराने की मांग की गई है।

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