निर्दलियों ने बनाया मजबूत आधार
चुनाव परिणामों के अनुसार करीब 63 प्रतिशत वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत हासिल की। इसके मुकाबले भारतीय जनता पार्टी 131 वार्डों तक सीमित रही, जबकि कांग्रेस को केवल 19 सीटें मिलीं। अन्य दलों का प्रदर्शन भी बेहद सीमित रहा।
भरतपुर नगर निगम में भी दिखा यही रुझान
65 सदस्यीय भरतपुर नगर निगम में निर्दलीय उम्मीदवार सबसे बड़े समूह के रूप में उभरे। यहां 36 वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशी विजयी हुए। BJP को 20 और कांग्रेस को 7 सीटों पर सफलता मिली।
राजनीतिक रूप से यह परिणाम इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि मतदान से पहले मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने क्षेत्र में पार्टी उम्मीदवारों के समर्थन में प्रचार किया था।
आसपास के जिलों से अलग रही तस्वीर
पूर्वी राजस्थान के कई जिलों में निर्दलीय उम्मीदवारों ने अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन भरतपुर और डीग में उनका प्रभाव कहीं अधिक दिखाई दिया। राज्य स्तर पर जहां निर्दलियों की हिस्सेदारी लगभग 22 प्रतिशत रही, वहीं इन दोनों जिलों में यह आंकड़ा 63 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गया।
अब बोर्ड गठन पर नजर
निकाय चुनाव परिणाम आने के बाद अब सभी की निगाहें महापौर और अध्यक्ष पद के चुनाव पर टिकी हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल दावा कर रहे हैं कि अधिकांश निर्दलीय पार्षद उनके समर्थक हैं और उनके सहयोग से बोर्ड का गठन किया जाएगा।
राजनीतिक संदेश क्या है?
विश्लेषकों का मानना है कि स्थानीय मुद्दों, टिकट वितरण से नाराजगी और व्यक्तिगत प्रभाव के कारण बड़ी संख्या में उम्मीदवार निर्दलीय मैदान में उतरे और सफल भी हुए। यही वजह रही कि कई जगहों पर पार्टी प्रत्याशियों को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा।
फिलहाल, भरतपुर और डीग के नतीजों ने यह संकेत जरूर दिया है कि स्थानीय निकाय चुनावों में मतदाता अक्सर राष्ट्रीय और विधानसभा चुनावों से अलग रुख अपनाते हैं। आने वाले दिनों में बोर्ड गठन की प्रक्रिया इस चुनाव की वास्तविक राजनीतिक तस्वीर और स्पष्ट करेगी।