International News:रूसी तेल पर अमेरिका की छूट खत्म! क्या भारत में फिर बढ़ेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम?

होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा खतरा मंडराने लगा है।

International News: दुनिया में बढ़ते तेल संकट के बीच भारत के सामने अब नई मुश्किल खड़ी होती दिखाई दे रही है। होर्मुज स्ट्रेट में तनाव और मिडिल ईस्ट में अस्थिरता के बीच अमेरिका ने रूसी तेल खरीद पर दी गई अस्थायी छूट खत्म कर दी है। ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या आने वाले दिनों में भारत में पेट्रोल-डीजल और एलपीजी की कीमतें फिर बढ़ सकती हैं?

दरअसल, यूक्रेन-रूस युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे। इसके बावजूद भारत और चीन ने रूस से बड़ी मात्रा में डिस्काउंट पर कच्चा तेल खरीदा। इससे भारत को महंगाई नियंत्रित रखने में काफी मदद मिली। रूस धीरे-धीरे भारत का सबसे बड़ा क्रूड ऑयल सप्लायर बन गया।

लेकिन अब हालात बदलते दिख रहे हैं। होर्मुज संकट के कारण पहले ही ग्लोबल सप्लाई चेन पर दबाव बना हुआ है। इसी बीच अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने पर दी गई राहत को आगे नहीं बढ़ाया। ट्रंप प्रशासन के इस फैसले के बाद भारतीय रिफाइनरी कंपनियों के सामने नया जोखिम खड़ा हो गया है।

क्यों बढ़ रही है चिंता?

भारत अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर पड़ता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, युद्ध से पहले कच्चे तेल की कीमत करीब 72 डॉलर प्रति बैरल थी, जो अब 105 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी है। अगर भारत को रूसी तेल की सप्लाई कम करनी पड़ी, तो उसे मिडिल ईस्ट के महंगे तेल पर निर्भर होना पड़ेगा।

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पेट्रोल-डीजल पर क्या पड़ेगा असर?

अगर कच्चा तेल लगातार महंगा रहता है तो आने वाले समय में पेट्रोल, डीजल, एलपीजी सिलेंडर, हवाई किराया और ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ सकते हैं। इससे महंगाई पर भी दबाव बढ़ेगा।

हालांकि सरकार के पास कुछ विकल्प मौजूद हैं। केंद्र टैक्स में कटौती कर राहत दे सकता है या सरकारी तेल कंपनियों को कुछ समय तक नुकसान सहने के लिए कह सकता है। लेकिन दोनों ही फैसलों का आर्थिक असर पड़ेगा।

भारत के सामने क्या हैं विकल्प?

भारत अब तेल सप्लाई को लेकर बैलेंस बनाने की कोशिश करेगा। सरकार दूसरे देशों से आयात बढ़ा सकती है या रणनीतिक तेल भंडार का इस्तेमाल कर सकती है। लेकिन अगर होर्मुज संकट लंबा चला और तेल कीमतें ऊंची बनी रहीं, तो ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी लगभग तय मानी जा रही है।

बढ़ सकता है आम आदमी पर बोझ

विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर लंबे समय तक बनी रहीं, तो इसका असर सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ेगा। ट्रांसपोर्ट महंगा होगा, खाने-पीने की चीजों की कीमत बढ़ेगी और घरेलू बजट पर दबाव बढ़ सकता है।

Written By: Ekta Verma

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