SIR 2026 : ‘लाखों लोगों का वोट छीनना मनमाना’, एसआईआर विवाद के बीच जस्टिस उज्जल भुइयां की दो टूक

SIR 2026 : SIR विवाद के बीच जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा कि लाखों नागरिकों को मताधिकार से वंचित करना मनमाना होगा। जानिए वोट के अधिकार, अनुच्छेद 326 और SIR पर उनकी अहम टिप्पणी।

SIR 2026 : चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को लेकर जारी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने मताधिकार को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया, जिसके कारण लाखों भारतीय नागरिकों को वोट देने के अधिकार से वंचित होना पड़े और वे अपने ही देश में ‘दूसरे दर्जे के नागरिक’ बन जाएं, संवैधानिक रूप से मनमानी होगी।

हैदराबाद में रविवार को 19वें NALSAR-Justice BR Sawhney Memorial Moot Court Competition के समापन समारोह में बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि कोई भी तर्क या सफाई बड़े पैमाने पर लोगों को मताधिकार से वंचित करने को उचित नहीं ठहरा सकती।

संविधान में वोट के अधिकार वाले और बिना वोट वाले नागरिकों की दो श्रेणियां नहीं

जस्टिस भुइयां ने कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों को वोट देने के अधिकार के आधार पर दो अलग-अलग वर्गों में नहीं बांटता। उनके मुताबिक, नागरिकता और मताधिकार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और इन्हें अलग नहीं किया जा सकता।

उन्होंने चेताया कि ऐसी कोई भी प्रशासनिक कार्रवाई, जो वयस्क मताधिकार की संवैधानिक गारंटी को कमजोर करती है, संविधान की मूल व्यवस्था पर असर डाल सकती है।

SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी उठे सवाल

SIR प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और सत्यापन नोटिस को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गई हैं। दिल्ली में याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि 31 अगस्त को प्रकाशित ड्राफ्ट मतदाता सूची में 47.56 लाख नाम शामिल नहीं थे। इसके अलावा 33.13 लाख मतदाताओं को ‘नो मैपिंग’ या ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर नोटिस के लिए चिन्हित किए जाने की बात कही गई।

22 सितंबर को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने चुनाव आयोग से इन याचिकाओं पर जवाब मांगा था। सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने आयोग से यह जांचने को कहा था कि नोटिस कहीं यांत्रिक तरीके से तो जारी नहीं किए जा रहे। CJI ने ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ शब्द के आधार पर भी स्पष्टीकरण मांगा था।

चुनाव आयोग ने अदालत को आश्वासन दिया था कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी मतदाता का नाम मतदाता सूची से नहीं हटाया जाएगा।

पश्चिम बंगाल में लाखों अपील लंबित

पश्चिम बंगाल में SIR के बाद मतदाता नामों को लेकर विवाद और अपील की स्थिति भी सामने आई है। चुनाव आयोग ने सितंबर में सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि adjudication के जरिए हटाए गए 27.16 लाख मतदाताओं में से 22.21 लाख ने अपने नाम हटाए जाने के खिलाफ अपील की है।

इसके अलावा 16.10 लाख अपीलें मतदाता सूची में नाम जोड़े जाने को चुनौती देने से जुड़ी थीं। इस तरह कुल अपीलों की संख्या 38.31 लाख बताई गई। इनमें से 37 लाख से अधिक अपीलें लंबित थीं। इसके बाद आयोग ने अपीलीय ट्रिब्यूनल की संख्या 19 से बढ़ाकर 42 करने का प्रस्ताव रखा।

जस्टिस भुइयां ने ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ का किया जिक्र

जस्टिस भुइयां ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने देश में व्यापक अशिक्षा और प्रशासनिक चुनौतियों के बावजूद सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को अपनाया था। यह फैसला हर वयस्क भारतीय को समान राजनीतिक आवाज देने में विश्वास का प्रतीक था।

उन्होंने डॉ. बीआर आंबेडकर के संविधान सभा में दिए भाषण का जिक्र करते हुए कहा कि राजनीतिक समानता के साथ सामाजिक और आर्थिक असमानता का विरोधाभास मौजूद था। उनके मुताबिक, ‘एक व्यक्ति, एक वोट और एक वोट, एक मूल्य’ समानता के सिद्धांत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

अनुच्छेद 325 और 326 का हवाला

जस्टिस भुइयां ने संविधान के अनुच्छेद 325 और 326 का उल्लेख करते हुए कहा कि मतदाता सूची और वयस्क मताधिकार से जुड़े प्रावधान नागरिकों के राजनीतिक अधिकारों की बुनियाद हैं।

उन्होंने कहा कि वोट देने का अधिकार भले ही मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त न हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में इसके संवैधानिक महत्व को स्वीकार किया है। उन्होंने People’s Union for Civil Liberties बनाम Union of India और Anoop Baranwal बनाम Union of India जैसे मामलों का भी उल्लेख किया।

जस्टिस भुइयां ने कहा कि मताधिकार पर संवैधानिक सीमाएं केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रशासनिक कार्रवाई पर भी लागू होती हैं।

मतदाता का नाम हटाने से पहले नोटिस और सुनवाई जरूरी

जस्टिस भुइयां ने 1995 के Lal Babu Hussain बनाम Electoral Registration Officer मामले का हवाला देते हुए मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया में सुरक्षा उपायों पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मृत मतदाता के मामले को छोड़कर मतदाता सूची में दर्ज नाम को नोटिस और सुनवाई का अवसर दिए बिना हटाया नहीं जा सकता।

उन्होंने मताधिकार को नागरिक की पहचान से जोड़ते हुए कहा कि इसे नागरिकता से अलग करना शरीर से आत्मा निकालने जैसा होगा।

अपने संबोधन के अंत में जस्टिस भुइयां ने संविधान की सर्वोच्चता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 326 के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती और कोई भी प्राधिकरण संविधान से ऊपर नहीं है।

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