
इजरायल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच टकराव अब गंभीर संवैधानिक संकट का रूप लेता दिखाई दे रहा है। सरकार ने पहली बार सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश को मानने से इनकार कर दिया है। विवाद मीडिया रेगुलेटर सेकेंड अथॉरिटी फॉर टेलीविजन एंड रेडियो (SATR) के संचालन को लेकर है।
सुप्रीम कोर्ट ने SATR की मौजूदा परिषद को काम जारी रखने की अनुमति दी थी, लेकिन सरकार ने इस आदेश को अवैध बताते हुए खारिज कर दिया। सरकार का कहना है कि परिषद में कानूनी रूप से आवश्यक सदस्यों की संख्या पूरी नहीं है, इसलिए उसके फैसलों को वैध नहीं माना जा सकता।
कैबिनेट ने सर्वसम्मति से फैसला लिया कि वह कोर्ट के आदेश का पालन नहीं करेगी। इसके बाद संचार मंत्री और न्याय मंत्री ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि सरकार ऐसे आदेशों को स्वीकार नहीं करेगी जिन्हें वह कानून के खिलाफ मानती है।
सरकार के इस कदम की विपक्ष और कानूनी विशेषज्ञों ने कड़ी आलोचना की है। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने इसे “जंगल राज की आहट” बताया, जबकि विपक्षी नेताओं का कहना है कि यह फैसला न्यायपालिका की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने वाला है।
डिप्टी अटॉर्नी जनरल ने भी चेतावनी दी है कि अदालत के आदेशों की अनदेखी कानून के शासन के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। पत्रकार संगठनों और लोकतंत्र समर्थक समूहों ने भी सरकार के फैसले पर चिंता जताई है।
यह विवाद अब केवल मीडिया रेगुलेटर तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इजरायल में न्यायपालिका, कार्यपालिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच शक्ति संतुलन की बड़ी परीक्षा बन चुका है। आने वाले दिनों में इस मामले पर होने वाले घटनाक्रम देश की राजनीति और संवैधानिक व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाल सकते हैं।



