
El Nino 2026: भारत में मॉनसून के बीच अब मौसम वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ गई है। इसकी वजह है अल-नीनो (El Niño), जो अब अधिक सक्रिय चरण में प्रवेश कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जुलाई के अंतिम सप्ताह और उसके बाद का समय यह तय करेगा कि देश में बारिश सामान्य रहेगी या कई हिस्सों में लंबी बारिश की कमी देखने को मिलेगी। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मौसम एजेंसियों ने भी संकेत दिए हैं कि जुलाई से सितंबर के बीच अल-नीनो के और मजबूत होने की संभावना है।
क्या है अल-नीनो?
अल-नीनो एक वैश्विक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री सतह तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इससे दुनिया भर के मौसम चक्र प्रभावित होते हैं।
भारत में इसका सबसे बड़ा असर दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पर पड़ता है। कई वर्षों में अल-नीनो के दौरान सामान्य से कम बारिश, लंबे सूखे दौर और अधिक गर्मी देखने को मिली है, हालांकि हर अल-नीनो वर्ष में एक जैसा असर नहीं होता।
अगले कुछ दिन क्यों हैं बेहद अहम?
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, जुलाई के अंतिम दिनों में यह स्पष्ट होगा कि:
- अल-नीनो कितनी तेजी से मजबूत हो रहा है।
- मॉनसून ट्रफ (Monsoon Trough) उत्तर भारत में कितनी सक्रिय रहती है।
- बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में नए कम दबाव (Low Pressure) के क्षेत्र बनते हैं या नहीं।
- अगस्त में बारिश सामान्य रहेगी या कमी दर्ज होगी।
यदि इस अवधि में पर्याप्त सिस्टम विकसित नहीं होते, तो अगस्त में कई राज्यों में बारिश का वितरण प्रभावित हो सकता है।
किन क्षेत्रों पर पड़ सकता है असर?
विशेषज्ञों के अनुसार अल-नीनो के मजबूत होने पर:
- उत्तर और मध्य भारत में बारिश के लंबे ब्रेक देखने को मिल सकते हैं।
- कृषि क्षेत्रों में वर्षा की कमी का जोखिम बढ़ सकता है।
- तापमान सामान्य से अधिक रह सकता है।
- कुछ इलाकों में कम बारिश तो कुछ स्थानों पर अत्यधिक बारिश जैसी असमान स्थिति भी बन सकती है।
यानी अल-नीनो का मतलब हर जगह सूखा नहीं होता, बल्कि वर्षा का पैटर्न अधिक असंतुलित हो सकता है।
किसानों और अर्थव्यवस्था पर असर
भारत की कृषि काफी हद तक मॉनसून पर निर्भर है। यदि अगस्त और सितंबर में बारिश सामान्य से कम रहती है तो:
- खरीफ फसलों की बुआई और उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
- खाद्य महंगाई बढ़ने का जोखिम रहेगा।
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है।
हाल ही में IMF ने भी कमजोर मॉनसून और अल-नीनो को भारत की आर्थिक वृद्धि के लिए प्रमुख जोखिमों में शामिल किया है।
क्या अभी घबराने की जरूरत है?
फिलहाल विशेषज्ञों का कहना है कि स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। अल-नीनो का प्रभाव पूरे देश में समान नहीं होता और स्थानीय मौसम प्रणालियां कई बार इसके असर को कम या ज्यादा कर सकती हैं। इसलिए अंतिम तस्वीर अगले कुछ सप्ताह के मौसमीय घटनाक्रम पर निर्भर करेगी।



