
Donald Trump: अमेरिका ने ब्रिटेन स्थित RAF Fairford एयरबेस से अपने सभी लंबी दूरी के बॉम्बर विमानों को वापस बुला लिया है। अमेरिकी रक्षा अधिकारियों के मुताबिक, एयरबेस पर तैनात अमेरिकी बॉम्बर्स को उनके होम बेस पर भेज दिया गया है। इस कदम को इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि RAF Fairford लंबे समय से अमेरिकी वायुसेना के लिए यूरोप में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बेस रहा है।
यह फैसला उस समय सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बेहद गंभीर दौर में है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही संकेत दे चुके हैं कि ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान को लेकर उनके सामने कई विकल्प मौजूद हैं। ऐसे में ब्रिटेन से अमेरिकी बॉम्बर्स की वापसी को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह सामान्य सैन्य पुनर्संयोजन है या इसके पीछे सुरक्षा से जुड़ी कोई बड़ी चिंता है।
RAF Fairford क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
ब्रिटेन का RAF Fairford अमेरिकी लंबी दूरी के बमवर्षक विमानों के लिए एक अहम ठिकाना रहा है। लंदन से करीब 100 मील यानी लगभग 160 किलोमीटर पश्चिम में स्थित यह एयरबेस अमेरिका के रणनीतिक अभियानों के लिए इस्तेमाल होता रहा है।
ईरान के खिलाफ हालिया सैन्य अभियान के दौरान भी यहां अमेरिकी B-52 और B-1 बॉम्बर विमानों की मौजूदगी देखी गई थी। इन विमानों की लंबी दूरी तक उड़ान भरने और भारी हथियार ले जाने की क्षमता के कारण इन्हें किसी भी बड़े सैन्य अभियान में महत्वपूर्ण माना जाता है।
ऐसे में इन सभी विमानों का एक साथ वापस अमेरिका लौटना सैन्य और रणनीतिक दोनों नजरियों से चर्चा का विषय बन गया है।
क्या आतंकी खतरे के कारण हटाए गए बॉम्बर?
अमेरिकी बॉम्बर्स की वापसी ऐसे समय हुई है जब ब्रिटेन में RAF Fairford से जुड़ी सुरक्षा घटनाओं और संभावित आतंकी साजिश की जांच चल रही है। रिपोर्टों के मुताबिक, एयरबेस के आसपास हुई एक सुरक्षा घटना के बाद ब्रिटिश एजेंसियों ने मामले की जांच शुरू की थी।
इसी जांच के दौरान मध्य लंदन में कथित आतंकी हमले की साजिश के शक में कुछ लोगों को हिरासत में लिया गया। जांच में ब्रिटेन और ईरान दोनों की नागरिकता रखने वाले एक व्यक्ति का नाम भी सामने आया। हालांकि, हिरासत में लिए गए लोगों को बाद में जमानत पर रिहा किए जाने की जानकारी सामने आई है।
ब्रिटिश अधिकारियों ने इस मामले में ईरान से संभावित संबंधों की जांच की है। दूसरी ओर, तेहरान ने इन आरोपों में अपनी भूमिका से इनकार किया है। इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि अमेरिकी बॉम्बर्स की वापसी सीधे तौर पर किसी आतंकी खतरे के कारण ही हुई है।
ईरान को लेकर ट्रंप ने क्या कहा?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर अपने रुख में किसी नरमी का संकेत नहीं दिया है। व्हाइट हाउस से ओहायो की रैली के लिए रवाना होते समय पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि उन्हें ईरान को लेकर कुछ फैसले लेने हैं।
ट्रंप के मुताबिक, ईरान बुरी तरह तबाह हो चुका है और अब सवाल यह है कि आगे का रास्ता आसान होगा या मुश्किल। उनके इस बयान को ईरान के खिलाफ संभावित आगे की सैन्य कार्रवाई के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
ट्रंप पहले भी कह चुके हैं कि ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान को लंबा खींचने के बजाय कुछ ही हफ्तों में निर्णायक स्थिति पैदा की जा सकती है। ऐसे में आने वाले दिनों में अमेरिका की रणनीति पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।
ईरान और पश्चिम के बीच बढ़ रहा तनाव
RAF Fairford से अमेरिकी बॉम्बर्स की वापसी को केवल एक घटना के तौर पर देखना मुश्किल है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब ईरान और पश्चिमी देशों के बीच तनाव कई स्तरों पर बढ़ा हुआ है।
ईरान पहले भी चेतावनी दे चुका है कि उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई के लिए इस्तेमाल होने वाले ठिकानों को वह वैध सैन्य निशाना मान सकता है। दूसरी तरफ ब्रिटिश अधिकारियों की ओर से ईरान से जुड़े प्रॉक्सी समूहों पर दूसरे देशों में आगजनी और हमलों में शामिल होने के आरोप लगाए गए हैं।
इन आरोपों का इस्तेमाल ब्रिटेन और उसके सहयोगी देश अपनी सुरक्षा चिंताओं को रेखांकित करने के लिए कर रहे हैं, जबकि ईरान इन आरोपों को खारिज करता रहा है।
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अमेरिका की सैन्य तैनाती पर भी नजर
इस पूरे घटनाक्रम के बीच अमेरिका की मध्य पूर्व में सैन्य मौजूदगी भी महत्वपूर्ण है। हाल में अमेरिकी नौसैनिक शक्ति से जुड़े बड़े सैन्य समूहों की तैनाती की जानकारी सामने आई है। इनमें USS Theodore Roosevelt एयरक्राफ्ट कैरियर और USS Makin Island Amphibious Ready Group शामिल हैं।
ऐसे में एक तरफ अमेरिका की कुछ रणनीतिक सैन्य संपत्तियों को यूरोप से वापस बुलाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ मध्य पूर्व में उसकी सैन्य क्षमता और तैनाती पर लगातार नजर रखी जा रही है।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि RAF Fairford से बॉम्बर विमानों की वापसी स्थायी रणनीतिक बदलाव है या अस्थायी सुरक्षा और परिचालन व्यवस्था। लेकिन ईरान को लेकर ट्रंप के आक्रामक बयानों और ब्रिटेन में सामने आए सुरक्षा अलर्ट के बीच इस फैसले ने अमेरिकी सैन्य रणनीति को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है।



