
Telegram ban : NEET की दोबारा परीक्षा से पहले Telegram प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को अहम टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि केवल एक समूह द्वारा परीक्षा दिए जाने के कारण 150 मिलियन Telegram यूजर्स के अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस तेजस करिया की अध्यक्षता वाली वेकेशन बेंच Telegram की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें केंद्र सरकार के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसके तहत 21 जून को प्रस्तावित NEET री-टेस्ट से पहले प्लेटफॉर्म पर रोक लगाने की बात कही गई थी।
कोर्ट ने पूछा- करोड़ों यूजर्स के अधिकार क्यों प्रभावित हों?
सुनवाई के दौरान जस्टिस तेजस करिया ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि नागरिकों का एक समूह परीक्षा दे रहा है, हम 150 मिलियन लोगों के अधिकारों को कैसे सीमित कर सकते हैं?”
अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाने से पहले उसके व्यापक प्रभावों पर विचार करना जरूरी है।
सरकार ने रखी सुरक्षा संबंधी चिंताएं
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि Telegram पर कई ऐसे ग्रुप और चैनल सक्रिय हैं, जिनके जरिए परीक्षा से जुड़ी संदिग्ध गतिविधियां संचालित होती हैं। उन्होंने कहा कि प्लेटफॉर्म को ऐसी गतिविधियों की जानकारी दिए जाने के बावजूद कई मामलों में समय पर कार्रवाई नहीं की गई।
सरकार का कहना था कि Telegram की क्लाउड आधारित संरचना के कारण कानून प्रवर्तन एजेंसियों को गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल वास्तविक यूजर्स की पहचान करने में कठिनाई होती है। यदि कोई अकाउंट ब्लॉक भी कर दिया जाए, तब भी उसके संचालक तक पहुंचना आसान नहीं होता।
Telegram ने कहा- आपत्तिजनक कंटेंट हटाने में रहे सक्रिय
Telegram की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ध्रुव मेहता ने सरकार के आरोपों का विरोध करते हुए कहा कि कंपनी ने आपत्तिजनक कंटेंट हटाने के लिए सक्रिय रूप से कार्रवाई की है।
उन्होंने अदालत को बताया कि सरकार का मुख्य तर्क यह है कि प्लेटफॉर्म पर रियल-टाइम मॉनिटरिंग संभव नहीं है, इसलिए प्रतिबंध आवश्यक है। Telegram का कहना है कि केवल इस आधार पर पूरे प्लेटफॉर्म पर रोक लगाना उचित नहीं होगा।
कोर्ट ने पूछा- परीक्षा से पहले असली और फर्जी पेपर की पहचान कैसे होगी?
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सवाल भी उठाया। अदालत ने कहा कि यदि परीक्षा से पहले कोई कथित प्रश्नपत्र सोशल मीडिया पर वायरल होता है, तो परीक्षा आयोजित होने से पहले यह कैसे तय होगा कि वह असली है या फर्जी?
इस पर Telegram की ओर से कहा गया कि कई मामलों में प्लेटफॉर्म पर वायरल किए जाने वाले कथित प्रश्नपत्र वास्तविक नहीं होते और उनका उद्देश्य केवल अफवाह फैलाना या लोगों से पैसे वसूलना होता है।
मामले में दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने आगे की सुनवाई जारी रखी।



