त्योहारों से पहले बढ़ी सरकार की चिंता
सितंबर से शुरू होने वाले त्योहारों के मौसम में खाद्य तेल की खपत बढ़ जाती है। मिठाइयों, नमकीन और अन्य खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ने के कारण तेल की खपत भी अधिक होती है। इसी वजह से सरकार कीमतों को नियंत्रित रखने के उपाय तलाश रही है।
आयात पर निर्भर है भारत
भारत अपनी खाद्य तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से मंगाता है। पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सूरजमुखी तेल का आयात मलेशिया, इंडोनेशिया, रूस, यूक्रेन और अर्जेंटीना जैसे देशों से किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारतीय बाजार पर भी पड़ता है।
कितना कम हो सकता है शुल्क?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकार खाद्य तेलों पर लगने वाली बेसिक इंपोर्ट ड्यूटी में लगभग 5 प्रतिशत तक कटौती पर विचार कर सकती है। हालांकि अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
किसानों के हित भी अहम
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती उपभोक्ताओं और किसानों के हितों के बीच संतुलन बनाए रखने की है। यदि आयातित तेल अधिक सस्ता हो जाता है, तो घरेलू तिलहन उत्पादकों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए किसी भी फैसले से पहले सभी पहलुओं का मूल्यांकन किया जा रहा है।
पहले भी मिल चुकी है राहत
सरकार इससे पहले भी खाद्य तेलों पर आयात शुल्क में कटौती कर चुकी है। मई 2025 में कच्चे पाम ऑयल, कच्चे सोयाबीन ऑयल और कच्चे सूरजमुखी तेल पर कस्टम ड्यूटी घटाई गई थी, ताकि बाजार में कीमतों को नियंत्रित किया जा सके।
क्या उपभोक्ताओं को तुरंत फायदा मिलेगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि आयात शुल्क घटने के बाद भी तेल की कीमतों में तुरंत बड़ी गिरावट जरूरी नहीं है। वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ने की स्थिति में राहत का असर सीमित हो सकता है। फिर भी सरकार का यह कदम बाजार में कीमतों को स्थिर रखने में मददगार साबित हो सकता है।
निष्कर्ष
त्योहारी सीजन से पहले खाद्य तेल की बढ़ती कीमतों को देखते हुए सरकार राहत देने के विकल्पों पर विचार कर रही है। यदि आयात शुल्क में कटौती का फैसला होता है, तो इसका असर आने वाले महीनों में उपभोक्ताओं की रसोई पर दिखाई दे सकता है।