बताया जाता है कि यह मंदिर करीब 400 साल पुराना है और बिहटा क्षेत्र में स्थित है। स्थानीय लोगों के बीच इस मंदिर को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं और कहानियां प्रचलित हैं। इन्हीं कथाओं ने फिल्म निर्माताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा।
वन देवी मंदिर की क्या है खासियत?
मंदिर में देवी की पूजा किसी मूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक पवित्र पिंड के रूप में की जाती है। मान्यता है कि यह स्थान कभी घने जंगलों से घिरा हुआ था। इसी वजह से देवी को वन देवी के नाम से जाना जाने लगा।
स्थानीय कथाओं के अनुसार, एक भक्त को देवी ने स्वप्न में दर्शन देकर पवित्र पिंड को जंगल क्षेत्र में स्थापित करने का निर्देश दिया था। इसके बाद यहां पूजा-अर्चना शुरू हुई और समय के साथ यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन गया।
सूर्यास्त के बाद क्यों नहीं जाते लोग?
मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित मान्यता यह है कि सूर्यास्त के बाद जंगल और मंदिर परिसर में जाने से बचने की सलाह दी जाती है। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा ने मंदिर को और भी रहस्यमयी बना दिया है। हालांकि यह धार्मिक मान्यता और स्थानीय लोककथाओं पर आधारित है।
कैसे बनी फिल्म की प्रेरणा?
फिल्म के लेखकों ने रिसर्च के दौरान मंदिर और उससे जुड़ी कहानियों का अध्ययन किया। स्थानीय लोगों और पुजारियों से बातचीत में उन्हें कई ऐसी लोककथाएं मिलीं, जिन्होंने फिल्म की कहानी को आकार देने में मदद की। खासकर जंगल और सूर्यास्त के बाद की मान्यताओं ने फिल्म के कथानक को नया आयाम दिया।
इसी वजह से ‘द वन’ सिर्फ एक मनोरंजक फिल्म नहीं, बल्कि बिहार की लोक संस्कृति और आस्था से जुड़ी कहानियों को बड़े पर्दे पर पेश करने का प्रयास भी मानी जा रही है।