
US Nuclear Strategy: अमेरिका अपने परमाणु रक्षा ढांचे में बड़ा बदलाव करने की तैयारी कर रहा है। सामने आई जानकारी के अनुसार, अमेरिकी रक्षा विभाग (Pentagon) नई परमाणु रणनीति पर काम कर रहा है, जिसमें छोटे और सीमित क्षमता वाले परमाणु हथियारों (Low-Yield Tactical Nuclear Weapons) को अधिक महत्व दिए जाने की बात कही जा रही है। इस रणनीति का उद्देश्य बड़े वैश्विक परमाणु युद्ध के बजाय क्षेत्रीय या सीमित सैन्य संघर्षों में प्रतिरोधक क्षमता (Deterrence) को मजबूत करना बताया जा रहा है।
क्या है नई रणनीति?
रिपोर्टों के मुताबिक, पेंटागन का मानना है कि भविष्य में अमेरिका को केवल एक बड़े परमाणु प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि चीन और रूस जैसे कई परमाणु शक्ति संपन्न देशों से एक साथ चुनौती मिल सकती है। इसी कारण नई रणनीति में ऐसी परमाणु क्षमताओं पर जोर दिया जा रहा है जिन्हें सीमित सैन्य संघर्षों के दौरान भी प्रभावी प्रतिरोधक विकल्प के रूप में देखा जा सके।
छोटे परमाणु हथियार क्यों?
छोटे या लो-यील्ड परमाणु हथियारों की विस्फोटक क्षमता पारंपरिक रणनीतिक परमाणु हथियारों की तुलना में कम होती है। समर्थकों का तर्क है कि इससे प्रतिरोधक क्षमता अधिक “विश्वसनीय” बनती है और सीमित संघर्षों में विकल्प उपलब्ध रहते हैं। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि ऐसे हथियारों पर अधिक निर्भरता परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की दहलीज को कम कर सकती है, जिससे किसी क्षेत्रीय युद्ध के बड़े परमाणु संघर्ष में बदलने का खतरा बढ़ सकता है।
क्यों बढ़ी वैश्विक चिंता?
परमाणु हथियारों से जुड़े विशेषज्ञों और हथियार नियंत्रण से जुड़ी संस्थाओं ने आशंका जताई है कि यदि बड़ी शक्तियां छोटे परमाणु हथियारों के विकास पर अधिक जोर देती हैं, तो वैश्विक हथियारों की नई दौड़ तेज हो सकती है। इससे परमाणु जोखिम बढ़ने और अंतरराष्ट्रीय हथियार नियंत्रण प्रयासों पर भी असर पड़ सकता है।
चीन और रूस पर रहेगा फोकस
विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका की यह नई रणनीति मुख्य रूप से चीन और रूस की बढ़ती सैन्य क्षमताओं को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है। हाल के वर्षों में तीनों देशों ने अपने-अपने परमाणु आधुनिकीकरण कार्यक्रमों को गति दी है, जिसके कारण वैश्विक सुरक्षा माहौल पहले की तुलना में अधिक जटिल हो गया है।
अभी अंतिम फैसला नहीं
फिलहाल यह रणनीति समीक्षा और नीति निर्माण के चरण में है। पेंटागन की ओर से अंतिम दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किया गया है और भविष्य में इसमें बदलाव संभव हैं। हालांकि, इस दिशा में हो रही चर्चा ने दुनिया भर में परमाणु सुरक्षा और हथियार नियंत्रण को लेकर नई बहस छेड़ दी है।


