सऊदी वायुसेना को मिलेगा बड़ा तकनीकी अपग्रेड
जानकारी के अनुसार सऊदी अरब ने 48 F-35 विमान, 49 इंजन और अन्य रक्षा प्रणालियों की मांग की थी। अमेरिकी विदेश विभाग का कहना है कि यह समझौता सऊदी अरब की सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करने और क्षेत्रीय खतरों से निपटने में मदद करेगा।
F-35 को दुनिया के सबसे उन्नत लड़ाकू विमानों में गिना जाता है। इसकी स्टील्थ तकनीक, आधुनिक सेंसर और नेटवर्क आधारित युद्ध क्षमता इसे बेहद प्रभावशाली बनाती है।
क्यों अहम मानी जा रही है यह डील?
सऊदी अरब लंबे समय से अपनी वायुसेना के आधुनिकीकरण पर काम कर रहा है। वर्तमान में उसके बेड़े में F-15, टॉरनेडो और टाइफून जैसे लड़ाकू विमान शामिल हैं। F-35 के शामिल होने से उसकी हवाई ताकत में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह सौदा ऐसे समय में हुआ है जब क्षेत्र में सुरक्षा चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं और कई देशों ने अपनी रक्षा तैयारियों को तेज कर दिया है।
इजरायल की बढ़त पर उठे सवाल
मध्य पूर्व में फिलहाल F-35 विमान संचालित करने वाला एकमात्र देश इजरायल है। ऐसे में सऊदी अरब को इस विमान की बिक्री को लेकर पहले भी चर्चा होती रही है। हालांकि अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यह समझौता क्षेत्रीय सैन्य संतुलन को प्रभावित नहीं करेगा और इजरायल की रणनीतिक बढ़त बनाए रखने की नीति जारी रहेगी।
हूती संघर्ष ने बढ़ाई सुरक्षा चिंता
हाल के महीनों में हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच तनाव बढ़ा है। दोनों पक्षों के बीच ड्रोन और मिसाइल हमलों की घटनाएं सामने आती रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में सऊदी अरब अपनी रक्षा क्षमताओं को और मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
अमेरिका और सऊदी अरब के बीच यह रक्षा समझौता आने वाले समय में मध्य पूर्व की सामरिक राजनीति और सुरक्षा समीकरणों पर असर डाल सकता है।