असाइनमेंट के नाम पर लूट: 1500-1600 रुपये लेकर थिसिज देने का खेल, छात्रों के भविष्य से खिलवाड़

Loot in the name of assignment: The game of giving theses for Rs 1500-1600, playing with the future of students.

एक ऑडियों सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है जिसमे छात्र से पैसा लेकर के छात्र को थिसिज उपलब्ध कराए जाने की बात हो रही है। यह ऑडियो प्रो राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) राज्य विश्वविद्यालय से संबद्ध नंद किशोर पीजी कॉलेज का बताया जा रहा है,जिसमें थिसिज के नाम पर छात्रों से अवैध वसूली का मामला सामने आया है। आरोप है कि शुभम नाम का कथित व्यक्ति छात्रों से पैसे लेकर तैयार असाइनमेंट उपलब्ध कराने का सौदा कर रहा है।

इस पूरे प्रकरण का एक ऑडियो भी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसने विश्वविद्यालय और उससे जुड़े कॉलेजों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वायरल ऑडियो में कथित शुभम साफ तौर पर एक छात्र से कहता सुनाई दे रहा है कि असाइनमेंट बनवाने के लिए उसे पैसे देने होंगे।

जब छात्र ने शुल्क के बारे में पूछा, तो दूसरी तरफ से 1600 रुपये की मांग की गई। छात्र द्वारा मोलभाव करने पर यह रकम घटाकर 1500 रुपये कर दी गई। बातचीत में यह भी सामने आया कि असाइनमेंट तुरंत नहीं दिया जाएगा, बल्कि मौखिक परीक्षा (वाइवा) के दिन ही छात्रों को उपलब्ध कराया जाएगा। इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि थिसिज जैसी शैक्षणिक प्रक्रिया को भी कमाई का जरिया बना दिया गया है। सबसे गंभीर बात यह है कि छात्रों को मेहनत करने के बजाय पैसे देकर ‘तैयार सामग्री लेने के लिए प्रेरित किया जा रहा है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।

छात्रों का कहना है कि इस तरह की गतिविधियां लंबे समय से चल रही हैं, लेकिन डर और दबाव के कारण वे खुलकर सामने नहीं आ पाते। अब जब ऑडियो सामने आया है, तो उम्मीद की जा रही है कि प्रशासन इस पर सख्त कार्रवाई करेगा।प्रो राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) राज्य विश्वविद्यालय से 700 से अधिक महाविद्यालय संबद्ध हैं। ऐसे में यह मामला सिर्फ एक कॉलेज तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि यह पूरे सिस्टम में व्याप्त संभावित अनियमितताओं की ओर इशारा करता है। यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह प्रवृत्ति छात्रों के भविष्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। असाइनमेंट का उद्देश्य छात्रों के ज्ञान और समझ को विकसित करना होता है, लेकिन जब इसे खरीद-फरोख्त का माध्यम बना दिया जाए, तो पूरी शिक्षा व्यवस्था पर ही प्रश्नचिह्न लग जाता है।

रिपोर्ट:आकाश त्रिपाठी

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