लखनऊ (ब्यूरो): Lucknow विरासत पर सवाल, हुसैनाबाद टूरिस्ट फैसिलिटेशन सेंटर टेंडर विवाद ने उठाए गंभीर प्रश्न

लखनऊ (ब्यूरो): इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के लिए विख्यात लखनऊ एक बार फिर प्रशासनिक पारदर्शिता और विरासत संरक्षण के मुद्दे पर चर्चा के केंद्र में है। हुसैनाबाद स्थित टूरिस्ट फैसिलिटेशन सेंटर की निविदा प्रक्रिया को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं, जिसने शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इस पूरे मामले को अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता रोहित कान्त के साथ एडवोकेट यशब हुसैन ने उठाया है। उन्होंने शासन को भेजी अपनी विस्तृत आपत्ति में दावा किया है कि महज़ तीन माह के भीतर टेंडर की शर्तों में ऐसे बदलाव किए गए, जो किसी एक विशेष कंपनी को लाभ पहुंचाने की मंशा को दर्शाते हैं। प्रस्तुत आपत्तियों के अनुसार, टेंडर प्रक्रिया में कई अहम बदलाव किए गए हैं। जैसे, वार्षिक किराया 20 लाख से घटाकर 8 लाख कर दिया गया, जिससे सरकारी खजाने को प्रतिवर्ष बड़ी क्षति की आशंका जताई जा रही है।

दूसरी ओर, न्यूनतम टर्नओवर शर्त को बदलकर स्थानीय प्रतिस्पर्धियों को बाहर करने का आरोप लगाया गया है। यही नहीं, संशोधित शर्तों के तहत करीब ₹48 लाख वार्षिक बिजली व्यय अब प्राधिकरण द्वारा वहन किया जाएगा। बात यही नहीं खत्म हुई, अनुबंध अवधि को 5 वर्ष से बढ़ाकर 10 वर्ष कर दिया गया, जिस पर सार्वजनिक औचित्य की कमी का सवाल उठाया गया है। सरकारी विभागों के साथ कार्य-अनुभव की अनिवार्यता समाप्त कर निजी क्षेत्र के अनुभव को पर्याप्त मान लिया गया।

अब इस विषय को लेकर कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी निविदाएँ अनुच्छेद 14 के तहत निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए। टेंडर शर्तों में मनमाने बदलाव, प्रतिस्पर्धा को सीमित करना और सार्वजनिक संसाधनों का संभावित दुरुपयोग, ये सभी न केवल विधिक उल्लंघन माने जा सकते हैं, बल्कि शासन की नैतिकता पर भी प्रश्नचिह्न लगाते हैं।

साथ ही, संविधान का अनुच्छेद 51क (च) नागरिकों और राज्य दोनों को देश की सामासिक संस्कृति के संरक्षण का दायित्व सौंपता है। ऐसे में ऐतिहासिक महत्व वाले हुसैनाबाद क्षेत्र से जुड़े इस विवाद ने सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा को भी केंद्र में ला दिया है। बता दे कि, हुसैनाबाद क्षेत्र, जो अपनी स्थापत्य कला और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है, वहां इस प्रकार के निर्णयों को लेकर स्थानीय स्तर पर असंतोष की स्थिति बनती दिख रही है। विरासत स्थलों के व्यावसायिक उपयोग में पारदर्शिता और संवेदनशीलता दोनों अपेक्षित मानी जाती हैं। सीनियर एडवोकेट रोहित कान्त ने शासन से इस ऐतिहासिक महत्व के विषय पर कई मांगें रखी हैं, जैसे, इस विवादित टेंडर प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाई जाए। संशोधन से संबंधित फाइलों की पारदर्शी जांच कराई जाए। विरासत के अनुरूप नई और निष्पक्ष निविदा प्रक्रिया शुरू की जाए।

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सीनियर एडवोकेट रोहित कांत ने बताया कि इस महत्वपूर्ण विषय की समयबद्ध कार्रवाई न होने पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ के सामने इस विषय को रखा जाएगा। एडवोकेट यशब हुसैन के मुताबिक, अब यह मामला केवल एक टेंडर विवाद भर नहीं रह गया है, बल्कि यह शासन की पारदर्शिता, विधिक प्रतिबद्धता और सांस्कृतिक विरासत के प्रति संवेदनशीलता की परीक्षा बनता जा रहा है। अब देखना होगा कि प्रशासन इन आरोपों पर क्या रुख अपनाता है और क्या इस विवाद का समाधान निष्पक्ष तरीके से हो पाता है या नहीं।
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