
- संत समाज ने सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए एकजुटता पर दिया जोर, रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में देशभर से जुटे करीब 1500 संत-महात्मा
Varanasi News : काशी में तीन दिवसीय संस्कृति संसद-2026 का भव्य शुभारंभ हुआ। सिगरा स्थित रुद्राक्ष अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर में आयोजित उद्घाटन सत्र में संतों और धर्माचार्यों ने सनातन धर्म एवं भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए समाज को जागरूक करने और संत समाज की एकजुटता पर जोर दिया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए ज्योतिषपीठाधीश्वर स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती जी महाराज ने गोमाता की रक्षा के लिए कानून बनाने की मांग की। वहीं, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रवींद्रपुरी जी महाराज ने कहा कि संत समाज सनातन धर्म पर हो रहे षड्यंत्रों से उसकी रक्षा के लिए सदैव तत्पर है।
संस्कृति संसद में देश के विभिन्न राज्यों से करीब 1500 संत, महामंडलेश्वर और आचार्य शामिल हुए। आयोजन में सनातन संस्कृति, सामाजिक चुनौतियों, शिक्षा, युवाओं की भूमिका और भारतीय परंपराओं के संरक्षण जैसे विषयों पर चर्चा हुई।
गोमाता की रक्षा के लिए कानून जरूरी: स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती
ज्योतिषपीठाधीश्वर स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती जी महाराज ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति को धर्म विरोधी हमलों से बचाने के लिए संस्कृति संसद जैसे आयोजन आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि संत वक्ताओं की ओर से रखे गए विचारों पर अमल करने की जरूरत है।
उन्होंने गो, गंगा और गीता को भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए कहा कि गोमाता की रक्षा के लिए कानून बनाया जाना चाहिए। उन्होंने वर्ष 1962 में करपात्री जी महाराज के नेतृत्व में हुए गो-रक्षा आंदोलन का उल्लेख करते हुए समाज और सरकार से इस दिशा में पहल करने का आग्रह किया।
शंकराचार्य ने हिंदू समाज को सनातन धर्म और संस्कृति पर हो रहे हमलों से बचाने तथा हिंदूविरोधी कानूनों में आवश्यक बदलाव करने की बात भी कही।
संत समाज सनातन धर्म की रक्षा के लिए एकजुट: रवींद्रपुरी महाराज
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रवींद्रपुरी जी महाराज ने कहा कि अखाड़ा परिषद और अखिल भारतीय संत समिति का प्रयास है कि देशभर का संत समाज एक मंच पर आकर भारतीय संस्कृति की रक्षा में योगदान दे।
उन्होंने कहा कि संस्कृति संसद के माध्यम से देश के विभिन्न पंथों के संतों को एक मंच पर लाने का प्रयास सफल हुआ है। भारतीय संस्कृति की रक्षा में संत समाज की ऐतिहासिक भूमिका रही है और आगे भी संत सनातन धर्म पर होने वाले हर षड्यंत्र से उसकी रक्षा के लिए तैयार हैं।
संस्कृति और धर्म विरोधी शक्तियों के खिलाफ जागरूकता का आह्वान
अखिल भारतीय संत समिति एवं गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती जी महाराज ने कहा कि वर्तमान समय में भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म के सामने कई चुनौतियां हैं। उन्होंने दिल्ली के जंतर-मंतर पर होने वाली गतिविधियों का उल्लेख करते हुए कहा कि संत समाज को इन परिस्थितियों को समझकर संस्कृति और धर्म के संरक्षण के लिए कार्य करना चाहिए।
उन्होंने जेन जी के नाम पर युवाओं को बांटने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई और युवाओं से समाज तथा राष्ट्र के विकास में योगदान देने का आह्वान किया।
विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक दिनेश जी ने विभिन्न कानूनों और सामाजिक मुद्दों पर अपने विचार रखते हुए कहा कि भारतीय समाज और परिवार की संरचना से जुड़े विषयों पर व्यापक विमर्श की आवश्यकता है। उन्होंने इन मुद्दों पर सरकार के समक्ष अपनी बात रखने की भी बात कही।
विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक जी ने धर्मांतरण और जनसंख्या से जुड़े मुद्दों का उल्लेख करते हुए समाज में जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने संत समुदाय से लोक जागरण के माध्यम से सनातन धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए कार्य करने का आह्वान किया।
गुरुकुल और संस्कार केंद्रों की स्थापना पर जोर
कथावाचक आचार्य सुधांशु जी महाराज ने कहा कि सनातन धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए गुरुकुलों तथा संस्कार केंद्रों की स्थापना आवश्यक है। उन्होंने संत समाज से इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाने का आग्रह किया।
जेन जी के संदर्भ में उन्होंने कहा कि युवाओं की चिंताओं और विरोध को नकारात्मक रूप में देखने के बजाय समाज एवं व्यवस्था को उनके मुद्दों पर विचार करना चाहिए। युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देना आवश्यक है।
आयोजन समिति के अध्यक्ष सुनील देवधर जी ने संस्कृति संसद की स्थापना की पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति और धर्म से जुड़े विषयों पर विमर्श के लिए इस मंच की प्रासंगिकता लगातार बढ़ रही है। उन्होंने युवाओं से राष्ट्र के विकास में योगदान देने का आह्वान किया।
देश-विदेश के कलाकारों की पेंटिंग और छायाचित्र बने आकर्षण
संस्कृति संसद के दौरान आयोजित कला एवं छायाचित्र प्रदर्शनी में देश-विदेश के कलाकारों की कलाकृतियां और तस्वीरें आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। प्रदर्शनी में पद्मश्री दुलारी देवी की मधुबनी पेंटिंग और पद्मश्री श्याम शर्मा की ओर से बनाई गई हनुमान जी की पेंटिंग विशेष रूप से प्रदर्शित की गई हैं।
काशी की धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को भी चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। प्रदर्शनी में काशी के घाटों पर आधारित तीन पेंटिंग, महादेव के विभिन्न स्वरूपों पर आधारित चित्र और काशी के अलग-अलग दृश्यों की सात पेंटिंग शामिल हैं। इसके अलावा मिथिला पेंटिंग और महाकुंभ से जुड़ी तीन कलाकृतियां भी प्रदर्शित की गई हैं। अशोक सिंघल की पेंटिंग कलाकार अंचल चौधरी ने बनाई है।
छायाचित्र प्रदर्शनी में हिंदू धर्म, संस्कृति और सामाजिक जीवन से जुड़े चित्र शामिल हैं। इसमें थाईलैंड के रुबेन तस्मार, अमेरिका के डॉ. वेनिडेक्टो रियार्स और एरिन ब्रिडेन ब्रिक तथा तुर्की की देरेया अजार अस्ता सेवर के छायाचित्र भी प्रदर्शित किए गए हैं।
कार्यक्रम स्थल के प्रवेश द्वार और प्रमुख स्थानों पर बनाई गई कलात्मक रंगोलियों के माध्यम से भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं को दर्शाया गया है।
जेन जी कॉन्क्लेव में युवाओं की भूमिका पर चर्चा
संस्कृति संसद-2026 के अंतर्गत आयोजित जेन जी कॉन्क्लेव में युवाओं की सामाजिक भूमिका, भारतीय संस्कृति और सोशल मीडिया के प्रभाव पर चर्चा हुई। कॉन्क्लेव में कुछ वक्ताओं ने जेन जी की अवधारणा को अमेरिकी दृष्टिकोण से विकसित बताते हुए कहा कि भारतीय युवाओं को केवल पश्चिमी सामाजिक अवधारणाओं के आधार पर नहीं समझा जा सकता।
प्रथम सत्र में डॉ. दीपक प्रधान ने कहा कि सोशल मीडिया के कारण युवाओं के व्यवहार और संवाद के तरीकों में बदलाव आया है। उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर युवाओं के आंदोलनों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय युवा अहिंसक तरीके से अपनी बात रखने में विश्वास करता है।
बनारस घराने के कथक नृत्यकार विशाल कृष्ण ने गुरु-शिष्य परंपरा को भारतीय कलाओं की जीवंतता का आधार बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति युवाओं को अनुशासन और सकारात्मक अभिव्यक्ति की प्रेरणा देती है।
दिल्ली सेंट्रल यूनिवर्सिटी की इशू मौर्य ने युवाओं से सोशल मीडिया पर विश्वसनीय सूचनाओं के आधार पर प्रतिक्रिया देने की अपील की। वक्ता भागेश जी ने युवाओं की ऊर्जा को सामाजिक निर्माण और राष्ट्र की उन्नति में लगाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सरकार और समाज को युवाओं की समस्याओं पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए।
भाजपा युवा मोर्चा के पूर्व अध्यक्ष किसलय तिवारी ने भारतीय परंपरा में कृष्ण, लव-कुश, नचिकेता और ध्रुव जैसे युवाओं के आदर्शों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारतीय युवाओं की पहचान अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी है।
कॉन्क्लेव के प्रथम सत्र की शुरुआत संस्कृति संसद के मुख्य गीत ‘हम हैं शाश्वत सत्य सनातन’ से हुई। इसमें वाराणसी के विभिन्न विद्यालयों और संस्थानों के छात्र-छात्राओं ने भाग लिया।
संस्कृति पर्व पत्रिका के विशेषांक का लोकार्पण
संस्कृति संसद के उद्घाटन सत्र के अंत में संस्कृति पर्व मासिक पत्रिका के विशेषांक का लोकार्पण मंचासीन अतिथियों ने किया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। संतों का माल्यार्पण कर स्वागत सुनील देवधर, प्रो. अरविंद जोशी और प्रो. ओमप्रकाश सिंह ने किया।
इस अवसर पर भारतीय संत समिति के अध्यक्ष कैवल्य पीठाधीश्वर जगद्गुरु अविचलदेवाचार्य जी महाराज, विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय जी, महामंडलेश्वर मनमोहन दास ‘राधे-रोध बाबा’, काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ त्रिपाठी, कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. रामचंद्र पांडेय और महामंत्री डॉ. रामनारायण द्विवेदी सहित अनेक संत-महात्मा उपस्थित रहे।
संस्कृति संसद में पश्चिम बंगाल, ओडिशा, झारखंड, बिहार, उत्तराखंड, राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गोवा, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के संतों ने भागीदारी की।



