
दिल्ली में CJP के नेतृत्व में हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों की ओर से हुई कथित हिंसा की जांच कर रही पांच सदस्यीय हाई पावर कमेटी में बदलाव की मांग को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि समिति के सदस्यों पर लगाए गए आरोप फिलहाल अटकलों और पहले से बनी धारणाओं पर आधारित हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समिति को उसकी विशेषज्ञता, अनुभव और विविधता को ध्यान में रखकर गठित किया गया है। अदालत ने समिति को अपना काम आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है।
समिति के पुनर्गठन की मांग क्यों उठी थी?
समिति में बदलाव की मांग करने वाले याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने एक सदस्य को लेकर हितों के टकराव की आशंका जताई थी। दलील दी गई कि समिति में शामिल पूर्वोत्तर राज्य के एक पूर्व डीजीपी की एक ऐसे वरिष्ठ अधिकारी से नजदीकी है, जिसकी भूमिका जांच के दायरे में आ सकती है।
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने भी इस दलील का समर्थन किया। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इन आरोपों का विरोध किया और अदालत से इन्हें खारिज करने का आग्रह किया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समिति ने अभी अपनी जांच शुरू ही की है। ऐसे में उसके सदस्यों की निष्पक्षता को लेकर पहले से धारणा बनाना उचित नहीं है। अदालत ने समिति में किसी तरह के बदलाव से इनकार कर दिया।
पैलेट गन और महिला प्रदर्शनकारियों से जुड़े मामलों की होगी जांच
सुप्रीम कोर्ट ने समिति को जांच का दायरा भी स्पष्ट किया है। एचपीईसी को कथित तौर पर पैलेट गन के इस्तेमाल, लक्षित हिंसा और महिला प्रदर्शनकारियों के उत्पीड़न से जुड़े आरोपों की जांच करनी होगी।
इसके अलावा पुलिसकर्मियों को लगी चोटों, प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई कथित हिंसा तथा संपत्ति को हुए नुकसान से जुड़े मामलों को भी जांच में शामिल किया गया है। यानी समिति केवल पुलिस कार्रवाई की शिकायतों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि प्रदर्शन के दौरान दोनों पक्षों से जुड़े आरोपों की पड़ताल करेगी।
संवेदनशील गवाहों की पहचान रहेगी गोपनीय
अदालत ने गवाहों की सुरक्षा को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। संवेदनशील गवाहों की पहचान और उनके द्वारा समिति के सामने दिए गए बयान या पेश किए गए सबूतों को गोपनीय रखने के लिए कहा गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि गवाहों और अन्य संबंधित लोगों को दस्तावेज और साक्ष्य सुरक्षित तरीके से उपलब्ध कराने की सुविधा देने के लिए एक अलग ऑनलाइन पोर्टल बनाया जा सकता है। इससे जांच के दौरान सामने आने वाली संवेदनशील जानकारी की सुरक्षा की जा सकेगी।
मोनिका गुसैन और सी. सोलोमन करेंगे सहायता
पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता मोनिका गुसैन और अधिवक्ता सी. सोलोमन को अदालत की सहायता के लिए नियुक्त किया है। दोनों समिति के प्रतिनिधि के तौर पर काम करने के साथ-साथ पक्षों के बीच स्वतंत्र मध्यस्थ की भूमिका भी निभाएंगे।
अदालत ने एचपीईसी से जल्द से जल्द सदस्य सचिव नियुक्त करने को भी कहा है, ताकि समिति को जांच के दौरान प्रशासनिक, लॉजिस्टिक और सचिवालय से जुड़ी जरूरी सहायता मिल सके।
पूर्व जज आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में बनी है कमेटी
सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त में पांच सदस्यीय हाई पावर कमेटी का गठन किया था। इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं। समिति को छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कथित ज्यादती के साथ-साथ पुलिस और सुरक्षा बलों के खिलाफ हुई कथित हिंसा की भी जांच करनी है।
समिति में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रवि शंकर झा, दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश शालिंदर कौर, पूर्व सीबीआई निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और मेघालय के सेवानिवृत्त डीजीपी एलआर बिश्नोई शामिल हैं।
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20 जुलाई के मार्च के बाद विवाद बढ़ा था
20 जुलाई को दिल्ली में CJP के नेतृत्व में संसद की ओर निकाले गए मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़प हुई थी। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया था।
इसी घटना से जुड़े पुलिस बल के इस्तेमाल, प्रदर्शनकारियों के साथ कथित ज्यादती और दूसरी ओर पुलिसकर्मियों के खिलाफ हुई हिंसा के आरोपों की निष्पक्ष जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एचपीईसी का गठन किया था। अदालत ने पहले भी स्पष्ट किया था कि समिति आरोपों की जांच, पीड़ितों की पहचान और सिफारिशें कर सकती है, लेकिन आपराधिक जांच या एफआईआर का आदेश देने का अधिकार अदालत के पास रहेगा।
अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद पांच सदस्यीय समिति अपने मौजूदा स्वरूप में ही जांच आगे बढ़ाएगी। अदालत ने समिति की निष्पक्षता पर उठाई गई आपत्तियों को इस चरण पर पर्याप्त आधार वाला नहीं माना है।



