

Global Oil Supply : पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच वैश्विक तेल आपूर्ति पर एक और बड़ा खतरा मंडरा रहा है। यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के हमलों के बाद सऊदी अरब ने अपनी महत्वपूर्ण ईस्ट-वेस्ट ऑयल पाइपलाइन को बंद कर दिया है। इस घटनाक्रम से वैश्विक तेल बाजार में चिंता बढ़ गई है और कारोबारियों ने चेतावनी दी है कि यदि पाइपलाइन जल्द बहाल नहीं हुई, तो दुनिया की करीब 4 प्रतिशत तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
सऊदी अरब दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक है। ऐसे में उसकी तेल ढुलाई व्यवस्था में रुकावट का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार के साथ-साथ भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों पर भी पड़ सकता है।
हूती हमलों के बाद पाइपलाइन बंद
सऊदी ऊर्जा मंत्रालय ने 12 सितंबर को बताया कि 11 सितंबर को हुए हमले के बाद ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को एहतियाती कदम के तौर पर बंद किया गया है। हूतियों ने सीधे तौर पर इन हमलों की जिम्मेदारी नहीं ली है, जबकि सऊदी अरब का दावा है कि हमले इराक में मौजूद उन ठिकानों से किए गए, जिनका इस्तेमाल हूती समूह करता है।
हूतियों ने लाल सागर मार्ग को लेकर चेतावनी देते हुए कहा है कि सऊदी जहाजों को छोड़कर अन्य कंपनियों के लिए समुद्री आवाजाही सुरक्षित है। इससे सऊदी तेल निर्यात के वैकल्पिक समुद्री मार्गों को लेकर भी चिंता बढ़ गई है।
1,200 किलोमीटर लंबी है ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन
सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन करीब 1,200 किलोमीटर लंबी है। इसका निर्माण 1980 के दशक में किया गया था। यह पाइपलाइन सऊदी तेल को देश के पूर्वी हिस्से से लाल सागर के पश्चिमी तट तक पहुंचाती है।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य में रुकावट के बाद सऊदी अरब ने इसी वैकल्पिक मार्ग के जरिए तेल निर्यात बढ़ाया था। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के हवाले से बताया गया है कि जून की शुरुआत तक लाल सागर स्थित बंदरगाह से सऊदी तेल निर्यात बढ़कर 50 लाख बैरल प्रतिदिन से अधिक हो गया था।
लाल सागर और बाब-अल-मंदेब पर हूतियों का बढ़ता नियंत्रण
हूतियों ने लाल सागर के तटीय इलाकों और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास अपनी पकड़ मजबूत की है। बाब-अल-मंदेब करीब 28 किलोमीटर चौड़ा समुद्री मार्ग है, जो वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
यदि इस मार्ग पर सऊदी तेल टैंकरों की आवाजाही बाधित होती है और ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन भी लंबे समय तक बंद रहती है, तो सऊदी अरब के तेल निर्यात पर गंभीर असर पड़ सकता है।
कारोबारियों के अनुसार, पाइपलाइन कुछ दिनों के भीतर चालू नहीं हुई तो वैश्विक बाजार से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में तेल की आपूर्ति प्रभावित होने का खतरा है।
कच्चे तेल की कीमतें फिर 100 डॉलर के पार
पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें पहले ही तेजी से बढ़ी हैं। ब्रेंट क्रूड की कीमत 104 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बताई जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पाइपलाइन जल्द शुरू नहीं हुई और लाल सागर मार्ग पर संकट बढ़ा, तो कच्चे तेल की कीमतों में और उछाल आ सकता है। इससे वैश्विक स्तर पर ईंधन, परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ने की आशंका है।
भारत पर क्या पड़ेगा असर?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से भारत का तेल आयात बिल बढ़ सकता है। महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। भारतीय रुपये पर दबाव पड़ सकता है। पेट्रोल-डीजल और परिवहन लागत प्रभावित हो सकती है। कंपनियों के मुनाफे और उत्पादन लागत पर असर पड़ सकता है।
HST Wealth के संस्थापक एवं CEO हरिसेलवन राधाकृष्णन के अनुसार, भारत के लिए कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी सबसे बड़ा बाहरी जोखिम है। पश्चिम एशिया से तेल आपूर्ति बाधित होने पर महंगाई, आयात बिल और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है।
सऊदी अरब भारत का बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता
ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भारत ने सऊदी अरब से तेल आयात बढ़ाया था। रिपोर्टों के अनुसार, इस अवधि में भारत का सऊदी अरब से कच्चे तेल आयात करीब 32 प्रतिशत बढ़ा, जिससे वह भारत का दूसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया।
ऐसे में यदि सऊदी तेल निर्यात और समुद्री मार्गों पर संकट बना रहता है, तो आने वाले दिनों में भारत को महंगे कच्चे तेल और आपूर्ति संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।



