
Atal Bihari Vajpayee Death Anniversary: पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि पर रविवार को देश ने उन्हें श्रद्धापूर्वक याद किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत देश के कई बड़े नेताओं ने ‘सदैव अटल’ पहुंचकर पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि दी। अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति में सिर्फ एक राजनेता के तौर पर नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में याद किए जाते हैं, जिन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों, राष्ट्रहित और सुशासन की राजनीति को अपनी अलग पहचान दी। उनकी भाषण शैली, कविताएं और राजनीतिक दूरदृष्टि आज भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी रहती हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अटल बिहारी वाजपेयी को याद करते हुए उनके योगदान और विचारों को नमन किया। पीएम मोदी लगातार यह कहते रहे हैं कि अटल जी का जीवन राष्ट्रसेवा और जनसेवा के लिए समर्पित रहा और उनका व्यक्तित्व आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा। अटल जी की राजनीति में विचारों की स्पष्टता के साथ-साथ संवाद और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को विशेष महत्व दिया जाता था। यही वजह है कि सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्ष के नेता भी कई मौकों पर उनके राजनीतिक कद और व्यक्तिगत गरिमा की प्रशंसा करते रहे हैं।
अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीतिक यात्रा को समझने के लिए 1980 का दौर बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। जनता पार्टी के प्रयोग के बाद भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ और दिसंबर 1980 में मुंबई में भाजपा का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित किया गया। भाजपा के आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक, यह अधिवेशन 28 से 30 दिसंबर 1980 के बीच आयोजित हुआ था। इसी दौर में अटल बिहारी वाजपेयी पार्टी के पहले अध्यक्ष बने और उन्होंने कार्यकर्ताओं के सामने संगठन की दिशा और अपनी राजनीतिक सोच को स्पष्ट किया था।
इसी ऐतिहासिक अधिवेशन से जुड़ी अटल बिहारी वाजपेयी की वह पंक्ति आज भी भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित राजनीतिक कथनों में गिनी जाती है—‘अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा और कमल खिलेगा।’ भाजपा के आधिकारिक अभिलेख में भी उनके भाषण के इस हिस्से को दर्ज किया गया है। वाजपेयी ने पश्चिमी घाट के सामने समुद्र के किनारे खड़े होकर भविष्य को लेकर विश्वास व्यक्त किया था और कहा था कि अंधकार दूर होगा, सूर्य उदय होगा और कमल खिलेगा।
यहां एक तथ्यात्मक बात भी महत्वपूर्ण है। यह भाषण 1980 का है, इसलिए 2026 के हिसाब से इसे 38 साल पुराना कहना सही नहीं होगा। इस ऐतिहासिक भाषण को करीब 46 साल हो चुके हैं। हालांकि, इतने लंबे समय बाद भी अटल जी का वह कथन भाजपा की राजनीतिक यात्रा के संदर्भ में बार-बार याद किया जाता है।
उस समय भारतीय जनता पार्टी एक नई राजनीतिक शक्ति थी और राष्ट्रीय राजनीति में उसका प्रभाव सीमित था। ऐसे दौर में पार्टी के पहले अध्यक्ष के तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी ने कार्यकर्ताओं में जिस आत्मविश्वास का संचार किया, वह आगे चलकर भाजपा की राजनीतिक यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा बना। उन्होंने अध्यक्ष पद को महज सम्मान या प्रतिष्ठा का पद नहीं माना, बल्कि उसे जिम्मेदारी और चुनौती के रूप में परिभाषित किया था। उनके लिए राजनीति का अर्थ सत्ता हासिल करना भर नहीं, बल्कि संगठन और विचारधारा के माध्यम से देश की सेवा करना था।
वाजपेयी की इसी राजनीतिक सोच ने आने वाले वर्षों में भाजपा की पहचान को आकार देने में भूमिका निभाई। पार्टी धीरे-धीरे देश के अलग-अलग हिस्सों में अपना संगठन मजबूत करती गई। 1990 के दशक में भाजपा राष्ट्रीय राजनीति की प्रमुख ताकत बनकर उभरी और अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री बने। 1996 में उन्होंने पहली बार प्रधानमंत्री पद संभाला, हालांकि सरकार बहुत कम समय चल सकी। इसके बाद 1998 और 1999 में वह फिर प्रधानमंत्री बने और 1999 से 2004 तक उनका कार्यकाल पूर्ण अवधि तक चला।
उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल को परमाणु परीक्षण, कारगिल युद्ध के दौरान नेतृत्व, बुनियादी ढांचे के विकास, राष्ट्रीय राजमार्गों और दूरसंचार क्षेत्र में सुधार जैसे कई महत्वपूर्ण फैसलों के लिए याद किया जाता है। साथ ही, अटल जी की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी था कि वह अपने विरोधियों के साथ संवाद बनाए रखने में विश्वास करते थे। संसद में उनके भाषणों की भाषा और शैली आज भी राजनीतिक वक्तृत्व की मिसाल मानी जाती है।
आज भाजपा देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों में से एक है और कई राज्यों में सीधे या अपने सहयोगी दलों के साथ सत्ता में है। 2026 में भाजपा और उसके सहयोगी दलों की सरकारों का दायरा दो दर्जन के करीब राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक पहुंच चुका है। मई 2026 में पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत के बाद NDA की सरकारों की संख्या 22 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक पहुंचने की रिपोर्ट सामने आई थी।
ऐसे में अटल बिहारी वाजपेयी का वह पुराना कथन भाजपा की राजनीतिक यात्रा के संदर्भ में आज भी चर्चा में आता है। हालांकि किसी भी राजनीतिक दल की सफलता को केवल एक नेता की भविष्यवाणी से जोड़ना इतिहास को सरल बना देना होगा, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि अटल जी ने उस समय एक ऐसे संगठन के भविष्य को लेकर बड़ा विश्वास व्यक्त किया था, जो आज भारतीय राजनीति की केंद्रीय शक्ति बन चुका है।
अटल बिहारी वाजपेयी की विरासत सिर्फ भाजपा के विस्तार तक सीमित नहीं है। उनकी पहचान एक कवि, वक्ता, सांसद और प्रधानमंत्री के रूप में भी रही। उनकी सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यह थी कि वह राजनीतिक असहमति के बावजूद संवाद की गुंजाइश बनाए रखते थे। यही कारण है कि उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए सिर्फ उनके समर्थक ही नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के अलग-अलग विचारधाराओं से जुड़े लोग भी उनके योगदान का उल्लेख करते हैं।
आज जब देश अटल बिहारी वाजपेयी को उनकी पुण्यतिथि पर याद कर रहा है, तब चार दशक से भी अधिक पुराना उनका वह विश्वास फिर चर्चा में है—अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा और कमल खिलेगा। वक्त बदल गया, राजनीति बदल गई और भाजपा की भूमिका भी बदल गई, लेकिन अटल जी के शब्द आज भी भारतीय राजनीति की स्मृतियों में उसी मजबूती के साथ मौजूद हैं।



