
Punjab Politics: पंजाब की राजनीति में एक बार फिर पुराने सियासी रिश्तों के लौटने की चर्चा तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के बीच लंबे समय से जमी दूरी अब कम होती दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की हालिया मुलाकात के बाद गठबंधन की संभावनाओं को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हैं। इस पूरी कवायद में हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी से सुखबीर बादल की मुलाकात से करीब दो दिन पहले चार अगस्त को चंडीगढ़ में नायब सैनी और सुखबीर बादल की करीब 20 मिनट तक बातचीत हुई थी। माना जा रहा है कि इसी मुलाकात के बाद सुखबीर बादल और प्रधानमंत्री मोदी के बीच बैठक का रास्ता साफ हुआ।
सैनी को मिली अहम जिम्मेदारी?
सुखबीर बादल से मुलाकात से पहले नायब सैनी ने पंजाब दौरे के दौरान जालंधर में कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों पर भरोसा रखने वाले दलों और नेताओं के लिए भाजपा के दरवाजे खुले हैं। इसके बाद सुखबीर बादल की सैनी से मुलाकात को काफी अहम माना गया।
पार्टी से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, भाजपा नेतृत्व ने नायब सैनी को पंजाब में संभावित गठबंधन को लेकर विभिन्न दलों और नेताओं से संपर्क साधने की जिम्मेदारी दी है। ऐसे में भाजपा और अकाली दल के बीच बढ़ती नजदीकियों को इसी राजनीतिक कवायद का हिस्सा माना जा रहा है।
मोदी से मुलाकात में किन मुद्दों पर हुई चर्चा?
प्रधानमंत्री मोदी और सुखबीर बादल की मुलाकात में पंजाब के राजनीतिक हालात के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होने की बात सामने आई है। बताया जा रहा है कि सुखबीर बादल ने पंजाब में कानून-व्यवस्था, गैंगस्टरवाद, किसान संगठनों, कारोबारियों, उद्यमियों और कर्मचारियों से जुड़े मुद्दे प्रधानमंत्री के सामने रखे।
बैठक के दौरान सुखबीर बादल ने अपने पिता और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल से जुड़े कुछ प्रसंग भी साझा किए। प्रधानमंत्री मोदी और प्रकाश सिंह बादल के बीच लंबे समय से आत्मीय राजनीतिक संबंध रहे हैं। अप्रैल 2019 में वाराणसी में नरेंद्र मोदी के नामांकन के दौरान भी मोदी ने प्रकाश सिंह बादल के पैर छूकर उनका अभिवादन किया था।
परिसीमन बिल पर भी चर्चा
सूत्रों के मुताबिक, बैठक में केंद्र के प्रस्तावित परिसीमन बिल को लेकर भी बातचीत हुई। शिरोमणि अकाली दल की एकमात्र सांसद हरसिमरत कौर बादल के समर्थन को लेकर भी चर्चा होने की बात कही जा रही है।
अगर अकाली दल और भाजपा के बीच राजनीतिक नजदीकियां आगे बढ़ती हैं, तो इसका असर पंजाब की आगामी चुनावी राजनीति पर पड़ना तय माना जा रहा है।
पुराना गठबंधन, नए सियासी समीकरण
भाजपा और शिरोमणि अकाली दल लंबे समय तक पंजाब में गठबंधन के साथी रहे हैं। दोनों दलों ने 1997, 2007 और 2012 में मिलकर सरकार बनाई थी। इससे पहले 1970 में भी अकाली सरकार को जनसंघ का समर्थन मिला था।
हालांकि, वर्ष 2020 में तीन कृषि कानूनों के मुद्दे पर दोनों दलों के बीच मतभेद बढ़ गए। इसके बाद अकाली दल ने एनडीए से नाता तोड़ लिया और दोनों पार्टियों का पुराना गठबंधन खत्म हो गया।
अब एक बार फिर दोनों दलों के बीच बातचीत और नजदीकियों के संकेत मिल रहे हैं। संभावित गठबंधन में अकाली दल के ग्रामीण सिख वोट बैंक और भाजपा के शहरी प्रभाव को साथ लाने की कोशिश हो सकती है। ऐसे में नायब सिंह सैनी की भूमिका पंजाब की आने वाली सियासत में काफी महत्वपूर्ण हो सकती है।



