CJI Suryakant Bail Case: CJI सूर्यकांत से अभद्रता मामले में प्रबल और चंदर भान को जमानत, कोर्ट ने कही बड़ी बात

पटियाला हाउस कोर्ट बोली- आचरण स्वीकार्य नहीं, लेकिन अनिश्चितकाल तक हिरासत उचित नहीं

CJI Suryakant Bail Case: नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के समक्ष कथित अभद्र व्यवहार के आरोप में गिरफ्तार दो कानून के छात्रों प्रबल प्रताप सिंह और चंदर भान को पटियाला हाउस कोर्ट ने जमानत दे दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपियों का व्यवहार पूरी तरह निंदनीय और अस्वीकार्य है, लेकिन केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर उन्हें अनिश्चितकाल तक न्यायिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता।

पटियाला हाउस कोर्ट के न्यायिक मजिस्ट्रेट रवि ने अपने आदेश में कहा कि सुप्रीम कोर्ट जैसी सर्वोच्च संवैधानिक संस्था किसी एक व्यक्ति के असंयमित व्यवहार से कमजोर नहीं पड़ती। उन्होंने कहा कि अधीनस्थ अदालतों को भी जमानत पर विचार करते समय सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रदर्शित संस्थागत संयम का पालन करना चाहिए।

अदालत ने उत्तर प्रदेश के इटावा निवासी और लखनऊ विश्वविद्यालय के तृतीय वर्ष के कानून छात्र प्रबल प्रताप सिंह तथा रायबरेली निवासी द्वितीय वर्ष के छात्र चंदर भान की जमानत याचिका स्वीकार करते हुए दोनों को 25-25 हजार रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।

दिल्ली पुलिस के अनुसार, 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट नंबर-13 में विशेष अनुमति याचिका की सुनवाई के दौरान प्रबल प्रताप सिंह स्वयं याचिकाकर्ता के रूप में पेश हुए थे। आरोप है कि सुनवाई के दौरान उन्होंने अभद्र और असंसदीय भाषा का प्रयोग किया, अदालत में दस्तावेज फेंके, कार्यवाही में बाधा डाली तथा सुरक्षा कर्मी के साथ मारपीट की। इस मामले में चंदर भान को भी सह-आरोपी बनाया गया है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि कोई भी पक्षकार, चाहे वह स्वयं अपनी पैरवी कर रहा हो या किसी निर्णय से असंतुष्ट हो, उसे न्यायालय में अभद्र भाषा का प्रयोग करने या मुख्य न्यायाधीश के पद की गरिमा पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं है। ऐसे आचरण की किसी भी स्थिति में अनुमति नहीं दी जा सकती।

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हालांकि, अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि घटना के दिन स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल कठोर कार्रवाई का निर्देश नहीं दिया था। साथ ही जांच पूरी हो चुकी है और पुलिस को आरोपियों से आगे हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं है। जिन धाराओं में मामला दर्ज किया गया है, उनमें अधिकतम दो वर्ष की सजा का प्रावधान है। अदालत ने पाया कि आरोपियों के स्थायी पते सत्यापित हैं और उनके फरार होने, साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने या गवाहों को प्रभावित करने की आशंका नहीं है। इसलिए उनकी निरंतर न्यायिक हिरासत उचित नहीं मानी जा सकती।

जमानत की शर्तों के तहत दोनों आरोपियों को जांच और ट्रायल के दौरान आवश्यकता पड़ने पर अदालत में उपस्थित होना होगा तथा भविष्य में सभी न्यायिक कार्यवाहियों के दौरान अदालत की गरिमा और शालीनता बनाए रखनी होगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश में की गई टिप्पणियां केवल जमानत के प्रश्न तक सीमित हैं और मुकदमे के अंतिम निर्णय को प्रभावित नहीं करेंगी।

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