
Guru Purnima 2026: सनातन धर्म में गुरु को भगवान से भी श्रेष्ठ स्थान दिया गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि गुरु ही वह शक्ति हैं, जो अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान का प्रकाश दिखाते हैं। इसलिए हर वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाई जाने वाली गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि गुरु के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने का विशेष अवसर भी है। लेकिन आज के समय में एक बड़ा सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है कि यदि किसी का कोई दीक्षा गुरु या आध्यात्मिक गुरु नहीं है, तो वह गुरु पूर्णिमा पर किसकी पूजा करे? सनातन धर्म की परंपराएं इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर देती हैं।
गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। उन्होंने चारों वेदों का विभाजन किया, महाभारत जैसे महान ग्रंथ की रचना की और अठारह पुराणों का संकलन कर सनातन ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाया। यही कारण है कि यदि किसी व्यक्ति का कोई गुरु नहीं है, तो गुरु पूर्णिमा के दिन महर्षि वेदव्यास का पूजन करना सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। उनके चित्र के सामने दीप प्रज्वलित कर ज्ञान, विवेक और सही मार्ग पर चलने की प्रार्थना करना शुभ फलदायी माना गया है।
सनातन परंपरा में भगवान शिव को आदिगुरु कहा गया है। मान्यता है कि योग, ध्यान और आध्यात्मिक ज्ञान का प्रथम उपदेश भगवान शिव ने ही दिया था। वहीं भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से पूरी मानवता को धर्म, कर्म और जीवन का संदेश दिया। ऐसे में यदि किसी को अभी तक कोई आध्यात्मिक गुरु नहीं मिला है, तो वह भगवान शिव या अपने इष्टदेव को गुरु मानकर उनकी पूजा कर सकता है। श्रद्धा और विश्वास से की गई प्रार्थना भी गुरु कृपा प्राप्त करने का माध्यम मानी गई है।
धार्मिक ग्रंथों में “मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव” का विशेष महत्व बताया गया है। माता-पिता जीवन के प्रथम गुरु होते हैं, जो हमें जीवन जीने के संस्कार देते हैं। इसके बाद शिक्षक हमें शिक्षा, ज्ञान और व्यक्तित्व निर्माण का मार्ग दिखाते हैं। इसलिए गुरु पूर्णिमा के दिन माता-पिता और अपने शिक्षकों का सम्मान करना, उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेना और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना भी गुरु पूजा के समान माना जाता है।
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यदि जीवन में कोई प्रत्यक्ष गुरु न हो, तो धर्मग्रंथ स्वयं गुरु का कार्य करते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता, रामायण, श्रीमद्भागवत, उपनिषद और अन्य धार्मिक ग्रंथ मनुष्य को सही और गलत का भेद समझाते हैं। ये ग्रंथ कठिन परिस्थितियों में भी सही निर्णय लेने की प्रेरणा देते हैं। गुरु पूर्णिमा के दिन इन धर्मग्रंथों का पूजन करना और उनके नियमित अध्ययन का संकल्प लेना आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।
गुरु पूर्णिमा का वास्तविक संदेश केवल किसी व्यक्ति विशेष की पूजा करना नहीं है, बल्कि उस ज्ञान, संस्कार और मार्गदर्शन के प्रति आभार प्रकट करना है जिसने हमारे जीवन को सही दिशा दी है। चाहे वह महर्षि वेदव्यास हों, भगवान शिव, श्रीकृष्ण, माता-पिता, शिक्षक या फिर धर्मग्रंथ—जो भी हमें अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाए, वही हमारे लिए गुरु है। यही गुरु पूर्णिमा का सबसे बड़ा संदेश और सनातन परंपरा का सार है।



