परिसीमन बिल 2026 : लोकसभा में 36 वोटों की चुनौती, क्या डीएमके और शरद पवार सरकार का साथ देंगे?

परिसीमन बिल 2026 : मानसून सत्र में प्रस्तावित परिसीमन बिल को पास कराने के लिए सरकार को लोकसभा में 36 अतिरिक्त वोटों की जरूरत है। डीएमके, शरद पवार की एनसीपी (एसपी) और अन्य विपक्षी दलों की भूमिका इस संवैधानिक संशोधन में निर्णायक मानी जा रही है।

नई दिल्ली। संसद के आगामी मानसून सत्र में केंद्र सरकार प्रस्तावित परिसीमन बिल को पारित कराने की तैयारी में है। हालांकि संविधान संशोधन से जुड़े इस विधेयक को मंजूरी दिलाना सरकार के लिए आसान नहीं माना जा रहा है। लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के लिए सरकार को मौजूदा संख्या के मुकाबले 36 अतिरिक्त सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होगी। ऐसे में विपक्षी दलों, खासकर डीएमके और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के रुख पर सभी की नजरें टिकी हैं।

सुप्रिया सुले के बयान से बढ़ी राजनीतिक हलचल

एनसीपी (शरदचंद्र पवार) की सांसद सुप्रिया सुले ने संकेत दिया है कि उनकी पार्टी परिसीमन बिल पर सरकार का समर्थन करने से पहले दो महत्वपूर्ण मुद्दों पर स्पष्टता चाहती है। इनमें लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव और आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा से जुड़ा विषय शामिल है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार इन मुद्दों पर सार्थक चर्चा के लिए तैयार होती है तो पार्टी विधेयक के समर्थन पर विचार कर सकती है।

लोकसभा में क्या है सरकार का गणित?

लोकसभा की प्रभावी सदस्य संख्या 540 मानी जा रही है। संविधान संशोधन पारित कराने के लिए दो-तिहाई यानी 360 सांसदों का समर्थन आवश्यक होगा।

लोकसभा का मौजूदा गणित

  • प्रभावी सदस्य संख्या: 540
  • दो-तिहाई बहुमत: 360
  • एनडीए के सांसद: 324
  • अतिरिक्त जरूरत: 36 वोट

यही वजह है कि सरकार विपक्षी दलों के समर्थन या मतदान से दूरी बनाने की संभावनाओं पर भी नजर बनाए हुए है।

एनसीपी (एसपी) और अन्य दल बन सकते हैं अहम

सूत्रों के अनुसार, सरकार विपक्ष के कुछ दलों के सांसदों से भी संपर्क में है। इनमें एनसीपी (शरदचंद्र पवार), झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम), आम आदमी पार्टी और नेशनल कॉन्फ्रेंस जैसे दलों के सांसदों का भी नाम चर्चा में है।

यदि एनसीपी (एसपी) के सभी सांसद सरकार का समर्थन करते हैं तो एनडीए का आंकड़ा बढ़ेगा, लेकिन इसके बाद भी बहुमत का लक्ष्य हासिल करने के लिए अतिरिक्त समर्थन की जरूरत बनी रहेगी।

क्यों अहम है डीएमके का रुख?

लोकसभा में डीएमके के 22 सांसद हैं। ऐसे में यदि डीएमके सरकार का समर्थन करती है तो सत्ता पक्ष बहुमत के बेहद करीब पहुंच सकता है। वहीं यदि पार्टी मतदान से दूरी बनाती है तो सदन में उपस्थित सदस्यों की संख्या कम होने से दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा भी घट सकता है।

यही कारण है कि राजनीतिक गलियारों में डीएमके को परिसीमन बिल की सबसे अहम कड़ी माना जा रहा है।

राज्यसभा में स्थिति अपेक्षाकृत आसान

राज्यसभा में सरकार की स्थिति लोकसभा की तुलना में बेहतर मानी जा रही है।

राज्यसभा का संभावित गणित

  • दो-तिहाई बहुमत: 164
  • सरकार का संभावित आंकड़ा: 158
  • जरूरत: 6 अतिरिक्त सांसद
  • या 12 सांसद मतदान से अनुपस्थित रहें

राज्यसभा में भी डीएमके के सांसदों की संख्या महत्वपूर्ण मानी जा रही है। ऐसे में यहां भी पार्टी का फैसला सरकार के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।

मानसून सत्र में होगी राजनीतिक परीक्षा

परिसीमन बिल केवल एक संवैधानिक संशोधन का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह संसद में राजनीतिक रणनीति, सहयोग और संख्या बल की बड़ी परीक्षा बनता दिखाई दे रहा है। सरकार जहां समर्थन जुटाने की कोशिश में है, वहीं विपक्ष अपने राजनीतिक और क्षेत्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए अंतिम रणनीति तय करेगा। ऐसे में मानसून सत्र के दौरान संसद का पूरा ध्यान इस विधेयक और उससे जुड़े नंबर गेम पर रहेगा।

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