UNCLOS South China Sea India China: UNCLOS पर भारत का बड़ा दांव! दक्षिण चीन सागर में चीन को दिया कड़ा संदेश

विदेश मंत्रालय ने दोहराया मुक्त और खुले समुद्र का समर्थन, UNCLOS के तहत नेविगेशन की आजादी और अंतरराष्ट्रीय कानून पर दिया जोर

UNCLOS South China Sea India China: दक्षिण चीन सागर (South China Sea) को लेकर एक बार फिर वैश्विक कूटनीति तेज हो गई है। इसी बीच भारत ने भी अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि समुद्र में आवाजाही की स्वतंत्रता, निर्बाध व्यापार और अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान हर देश के लिए जरूरी है। विदेश मंत्रालय ने दोहराया कि भारत का यह रुख संयुक्त राष्ट्र के समुद्र के कानून पर कन्वेंशन (UNCLOS) के अनुरूप है और इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है।

यह बयान ऐसे समय आया है, जब कई देशों ने 2016 में आए अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल के फैसले का समर्थन करते हुए दक्षिण चीन सागर पर चीन के व्यापक दावों को कानूनी आधारहीन बताया है।

भारत ने क्या कहा?

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत हमेशा से समुद्र में नेविगेशन की स्वतंत्रता, ओवरफ्लाइट की आजादी, वैध समुद्री गतिविधियों और निर्बाध व्यापार का समर्थक रहा है। उन्होंने कहा कि समुद्री विवादों का समाधान अंतरराष्ट्रीय कानून और UNCLOS के प्रावधानों के अनुसार शांतिपूर्ण तरीके से होना चाहिए।

आखिर क्या है UNCLOS?

UNCLOS (United Nations Convention on the Law of the Sea) एक अंतरराष्ट्रीय संधि है, जिसे अक्सर ‘महासागरों का संविधान’ कहा जाता है। इसे 1982 में अपनाया गया और 1994 में लागू किया गया। इसका उद्देश्य दुनिया के महासागरों और समुद्री क्षेत्रों के उपयोग के लिए एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना है।

इस संधि के तहत देशों के समुद्री अधिकार, आर्थिक क्षेत्र (EEZ), अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र, समुद्री संसाधनों के उपयोग, पर्यावरण संरक्षण और समुद्री विवादों के समाधान से जुड़े नियम तय किए गए हैं।

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दक्षिण चीन सागर को लेकर विवाद क्यों?

दक्षिण चीन सागर दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। चीन इस क्षेत्र के बड़े हिस्से पर अपना दावा करता है, जबकि फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान भी इसके अलग-अलग हिस्सों पर दावा करते हैं।

साल 2016 में हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल ने फिलीपींस के पक्ष में फैसला सुनाते हुए चीन के व्यापक दावों को कानूनी आधारहीन बताया था। हालांकि, चीन ने इस फैसले को स्वीकार नहीं किया और आज भी अपने दावे पर कायम है।

चीन की प्रतिक्रिया

हाल के दिनों में अमेरिका, जापान, फिलीपींस, यूरोपीय संघ समेत कई देशों ने ट्रिब्यूनल के फैसले का समर्थन किया है। इसके बाद चीन ने इन देशों से इस फैसले का समर्थन बंद करने की अपील की और इसे अवैध करार दिया।

भारत के रुख का क्या मतलब?

भारत दक्षिण चीन सागर का प्रत्यक्ष दावेदार नहीं है, लेकिन इस समुद्री मार्ग से भारत का बड़ा व्यापार गुजरता है। ऐसे में भारत लगातार यह कहता रहा है कि समुद्री व्यापार बिना किसी बाधा के जारी रहना चाहिए और सभी देशों को अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करना चाहिए। भारत का ताजा बयान भी इसी स्थापित नीति की पुनर्पुष्टि माना जा रहा है।

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