
India Defence Export 2026 : भारत के रक्षा निर्यात में वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान ऐतिहासिक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के अनुसार, देश का डिफेंस एक्सपोर्ट इस वर्ष 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो पिछले वित्त वर्ष के 23,622 करोड़ रुपये की तुलना में 62.66 प्रतिशत अधिक है।
रक्षा मंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस उपलब्धि को भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमताओं पर बढ़ते वैश्विक भरोसे का प्रमाण बताया। उन्होंने कहा कि जो भारत कभी हथियारों के आयात के लिए जाना जाता था, वह अब तेजी से रक्षा निर्यात के क्षेत्र में अपनी मजबूत पहचान बना रहा है। वर्ष 2014 में जहां देश का रक्षा निर्यात लगभग 600 करोड़ रुपये था, वहीं अब यह बढ़कर करीब 38,500 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।
पिछले 12 वर्षों में भारत के रक्षा निर्यात में 35 हजार करोड़ रुपये से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं, केवल एक वर्ष में ही करीब 14,800 करोड़ रुपये का इजाफा हुआ है, जो देश की रक्षा उत्पादन क्षमता में तेजी से हुए विकास को दर्शाता है।
रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, इस उपलब्धि में डिफेंस पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (DPSU) और निजी क्षेत्र दोनों का अहम योगदान रहा है। कुल निर्यात में DPSU की हिस्सेदारी 54.48 प्रतिशत रही, जबकि निजी क्षेत्र का योगदान 45.16 प्रतिशत दर्ज किया गया। यह साझेदारी देश में आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी सरकारी पहल का असर अब रक्षा क्षेत्र में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। लगातार बढ़ते निर्यात के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि भारतीय रक्षा उद्योग वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है।
वर्ष 2023-24 में भारत का रक्षा निर्यात 21,083 करोड़ रुपये था, जो 2024-25 में बढ़कर 23,622 करोड़ रुपये हो गया और अब 2025-26 में नई ऊंचाई पर पहुंच गया है। यह निरंतर वृद्धि भारत की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को दर्शाती है।
भारतीय हथियारों की बढ़ती मांग
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय हथियारों और रक्षा उपकरणों की वैश्विक मांग तेजी से बढ़ रही है। इससे न केवल देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी, बल्कि वैश्विक रणनीतिक संतुलन पर भी असर पड़ेगा। विशेष रूप से वे देश, जो अभी तक रक्षा जरूरतों के लिए अन्य देशों पर निर्भर हैं, उनके लिए यह एक नई चुनौती बन सकती है।



