Prayagraj News-पुलिस सुरक्षा ‘ स्टेटस सिंबल ‘ बन गई है : हाईकोर्ट

पुलिस सुरक्षा कोई वैधानिक या मौलिक अधिकार नहीं, याचिका खारिज

Prayagraj News-इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि पुलिस सुरक्षा ‘स्टेटस सिंबल’ बन गई है और राज्य कोई विशेषाधिकृत वर्ग नहीं बना सकती। पुलिस सुरक्षा के लिए आवेदन करने वालों को अपने जीवन के लिए वास्तविक खतरे को साबित करना होगा। उन्हें बताना होगा कि वह किस प्रकार के खतरे का सामना कर रहे हैं। खतरे का आकलन करना प्राधिकारियों का काम , कोर्ट का नहीं।

आसन्न खतरे की आशंका को देखते हुए राज्य पुलिस सुरक्षा दे सकती है, किंतु यह पारदर्शी व उचित प्रक्रिया के तहत दी जाय।

अलीगढ़ के विकास चौधरी व अन्य की याचिका खारिज करते हुए न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव तथा न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने कहा, पुलिस सुरक्षा कोई वैधानिक या मौलिक अधिकार नहीं है, इसलिए वह इस मामले में कोई निर्देश नहीं देगा।

याचीगण विकास चौधरी तथा सुशील चौधरी ने केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के सचिव को इस आशय का निर्देश देने की मांग करते हुए यह याचिका दायर की थी कि उन्हें तत्काल सशस्त्र केंद्रीय सुरक्षा बल (सीआरपीएफ) सुरक्षा प्रदान की जाए। उनका कहना था कि उन्होंने तीन एफआइआर दर्ज कराई हैं। पहली उनके ईंट भट्ठे की चहारदीवारी और श्रमिक आवासों को तोड़ने के संबंध में है, दूसरी फर्जी ट्रस्ट/दस्तावेज से संबंधित है और तीसरी उनके मोबाइल फोन की हैकिंग से। कोर्ट ने कहा, याचिका में दिए गए कथनों के अवलोकन से एक भी ऐसा विशिष्ट उदाहरण सामने नहीं आया जिसके आधार पर यह माना जा सके कि उनकी जान का कोई खतरा है। उनकी शिकायत पर दर्ज एफआइआर में किसी भी ऐसे व्यक्ति का नाम नहीं है जिसने याचीगण और उनके परिवार के सदस्यों को जान से मारने की धमकी दी हो।

कोर्ट ने पाया कि छह अगस्त 2023 के आदेश द्वारा उन्हें पुलिस की तरफ से एक सुरक्षा गार्ड प्रदान किया गया है। कोर्ट ने कहा,यह स्पष्ट है कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा किए गए खतरे के आकलन को ध्यान में रखते हुए पहले ही पुलिस सुरक्षा प्रदान की जा चुकी है। परिस्थितियों और इस संबंध में निर्धारित कानून को ध्यान में रखते हुए, यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि खतरे की आशंका की प्रकृति और सुरक्षा प्रदान करने की जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों द्वारा तय की जानी चाहिए न कि इस न्यायालय द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए निर्धारित किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा, हमारे देश का लिखित संविधान है और इसकी प्रस्तावना के अनुसार भारतीय लोकतांत्रिक गणराज्य का लक्ष्य सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से न्याय दिलाना और सभी को समान अवसर प्रदान करना है। ऐसे में राज्य को समाज में विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग बनाने वाले के रूप में नहीं देखा जा सकता क्योंकि यह संविधान में निहित न्याय और समानता के मूल सिद्धांत का उल्लंघन होगा। ऐसे मामले हो सकते हैं जहां जनहित में व्यक्तिगत सुरक्षा प्रदान करना आवश्यक हो, लेकिन यह पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से किया जाना चाहिए और यदि न्यायालय में इसे चुनौती दी जाती है तो राज्य को अपने निर्णय को उचित ठहराने में सक्षम होना चाहिए।

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