
New Delhi News-प्रधानमंत्री आवास के नजदीक स्थित दिल्ली की रेस कोर्स मस्जिद को लेकर विवाद गहरा गया है। मस्जिद प्रबंधन को परिसर खाली करने के लिए छह दिन का समय दिए जाने की खबर सामने आने के बाद कई संगठनों और नेताओं ने इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की है। दूसरी ओर, सरकारी भूमि अधिकारियों का कहना है कि संबंधित जमीन केंद्र सरकार के भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) के अधीन है और वहां अनधिकृत कब्जे का मामला है।
इस विवाद में मस्जिद की ऐतिहासिक पहचान, जमीन के स्वामित्व और वक्फ संपत्ति के रूप में उसके दर्ज होने से जुड़े सवाल प्रमुख हो गए हैं। फिलहाल, दोनों पक्षों के दावों के बीच जमीन से संबंधित दस्तावेजों और कानूनी स्थिति की जांच महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
1977 से वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज होने का दावा
दिल्ली वक्फ बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी तनवीर अहमद के अनुसार, मस्जिद और उससे जुड़ा लगभग दो बीघा का कब्रिस्तान 8 सितंबर 1977 को दिल्ली प्रशासन की अधिसूचना के तहत वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज किया गया था। मस्जिद का नाम नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (NDMC) की हेरिटेज सूची में भी शामिल होने की बात कही गई है। इसके अलावा, इसके वक्फ रिकॉर्ड और UMEED पोर्टल पर पंजीकरण का भी दावा किया गया है।
बताया जाता है कि मस्जिद करीब 125 साल पुरानी है। हालांकि, वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज होने और जमीन के सरकारी स्वामित्व से जुड़े दावों के बीच कानूनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए संबंधित दस्तावेजों का परीक्षण जरूरी है।
क्या है नोटिस और बिजली-पानी बंद होने का मामला?
मस्जिद से जुड़े लोगों के मुताबिक, परिसर खाली करने के लिए छह दिन की समयसीमा वाला नोटिस दिया गया है। उनका यह भी कहना है कि 7 अक्टूबर को इलाके में झुग्गियों को हटाने की कार्रवाई के दौरान मस्जिद की बिजली और पानी की आपूर्ति बंद कर दी गई थी।
मस्जिद के इमाम का दावा है कि वह करीब 40 वर्षों से वहां अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं और पहले इस तरह का विवाद सामने नहीं आया था। उनके अनुसार, मस्जिद तक पहुंचने में भी परेशानी हो रही है और नमाज अदा करने के लिए प्रवेश की अनुमति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
वहीं, सरकारी अधिकारियों के अनुसार, कार्रवाई केवल मस्जिद तक सीमित नहीं है। आसपास रहने वाले परिवार भी इससे प्रभावित हुए हैं। अधिकारियों का कहना है कि संबंधित जमीन पर अनधिकृत कब्जे और निर्माण के खिलाफ कदम उठाए जा रहे हैं। प्रभावित लोगों को दूसरी जगह आवास उपलब्ध कराने की बात भी कही गई है।
सरकारी जमीन होने की दलील दे रहा L&DO
भूमि एवं विकास कार्यालय का पक्ष है कि संबंधित परिसर केंद्र सरकार की जमीन पर स्थित है। इसी आधार पर इसे अतिक्रमण का मामला माना जा रहा है। मस्जिद से जुड़े पक्ष इस दावे पर सवाल उठाते हुए वक्फ अधिसूचना और ऐतिहासिक रिकॉर्ड का हवाला दे रहे हैं।
इस मामले में मुख्य सवाल यह है कि जमीन के स्वामित्व, मस्जिद की स्थिति और संबंधित अधिसूचनाओं का कानूनी प्रभाव क्या है। इन बिंदुओं पर आधिकारिक दस्तावेजों और सक्षम प्राधिकरण के फैसले से ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
ओवैसी ने किरेन रिजिजू से हस्तक्षेप की मांग की
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू से मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब मस्जिद को 1977 से वक्फ संपत्ति बताया जा रहा है, तो उसके संरक्षण के लिए संबंधित अधिकारियों ने प्रभावी कानूनी कदम क्यों नहीं उठाए।
ओवैसी ने सरकार से कार्रवाई से जुड़े नोटिस की समीक्षा करने और मस्जिद की स्थिति स्पष्ट करने की मांग की। उन्होंने धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में कानून और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर निर्णय लेने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
जमीयत और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी उठाई आवाज
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के एक प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा। प्रतिनिधिमंडल ने रेस कोर्स मस्जिद और सफदरजंग मकबरे के पीछे स्थित कब्रिस्तान के संरक्षण के लिए हस्तक्षेप करने की मांग की।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने भी केंद्र सरकार से नोटिस वापस लेने और मामले की समीक्षा करने की अपील की है। बोर्ड का कहना है कि मस्जिद के ऐतिहासिक अस्तित्व और वक्फ संपत्ति होने से संबंधित रिकॉर्ड को ध्यान में रखकर फैसला लिया जाना चाहिए।
कश्मीर के मीरवाइज उमर फारूक ने भी इस मामले पर चिंता जताई है। उन्होंने मस्जिद की ऐतिहासिक पहचान और वक्फ रिकॉर्ड का हवाला देते हुए संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं।
अब दस्तावेजों और कानूनी स्थिति पर टिकी नजर
रेस कोर्स मस्जिद का मामला अब ऐतिहासिक विरासत, धार्मिक स्थल के संरक्षण और सरकारी भूमि के अधिकार से जुड़े सवालों के केंद्र में आ गया है। एक तरफ मस्जिद से जुड़े पक्ष पुराने रिकॉर्ड और वक्फ अधिसूचना का हवाला दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकारी एजेंसी जमीन पर अनधिकृत कब्जे की बात कह रही है।
ऐसे में आगे की कार्रवाई से पहले जमीन के स्वामित्व, वक्फ अधिसूचना और लागू कानूनी प्रावधानों की निष्पक्ष जांच अहम होगी। मामले में सक्षम प्राधिकरण का निर्णय ही विवाद की वास्तविक स्थिति को स्पष्ट करने में निर्णायक भूमिका निभाएगा।
नोट- खबर में संबंधित पक्षों के दावों को अंतिम कानूनी निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।



