
Khair Assembly Seat: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक दलों की तैयारियां तेज होने के साथ अलीगढ़ की खैर विधानसभा सीट भी अहम चर्चा में है। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित इस सीट का चुनावी समीकरण केवल एससी मतदाताओं तक सीमित नहीं है। यहां जाट मतदाताओं की बड़ी संख्या लंबे समय से चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। उपलब्ध अनुमानों के मुताबिक खैर में जाट मतदाता सबसे बड़ा समूह हैं, जबकि एससी और ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या भी चुनावी गणित में अहम मानी जाती है।
आरक्षित सीट, लेकिन जाट वोटों का खास प्रभाव
खैर विधानसभा क्षेत्र संख्या 71 अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। इसका मतलब है कि यहां चुनाव लड़ने वाले प्रमुख दलों के उम्मीदवार एससी वर्ग से ही होते हैं। इसके बावजूद क्षेत्र की सामाजिक संरचना में जाट समुदाय की बड़ी आबादी होने के कारण चुनावी रणनीति में इस वर्ग को विशेष महत्व मिलता है।
2024 के उपचुनाव से पहले उपलब्ध आंकड़ों में खैर में करीब 1.10 से 1.15 लाख जाट मतदाताओं का अनुमान लगाया गया था। अलग-अलग स्रोतों में ब्राह्मण और एससी मतदाताओं की संख्या को लेकर भी अलग-अलग अनुमान सामने आए हैं। इसलिए इन आंकड़ों को आधिकारिक जातिवार मतदाता सूची नहीं, बल्कि चुनावी विश्लेषण के अनुमान के तौर पर देखना चाहिए।
2022 में बीजेपी की बड़ी जीत
2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के अनूप प्रधान वाल्मीकि ने खैर सीट पर बड़ी जीत दर्ज की थी। उन्हें 1,39,643 वोट मिले थे, जबकि बसपा की चारू कैन को 65,302 वोट प्राप्त हुए। आरएलडी-सपा गठबंधन के प्रत्याशी भगवती प्रसाद 41,644 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे थे।
इन नतीजों में बीजेपी और बसपा के बीच करीब 74 हजार वोटों का अंतर रहा। चुनाव परिणामों से यह भी स्पष्ट हुआ कि जाट बहुल माने जाने वाले क्षेत्र में किसी एक दल के पक्ष में पूरा जाट वोट जाना जरूरी नहीं है और उम्मीदवार तथा गठबंधन के समीकरण भी परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं।
2024 लोकसभा चुनाव में बदली तस्वीर
2024 के लोकसभा चुनाव में खैर विधानसभा क्षेत्र के परिणामों ने पिछले विधानसभा चुनाव की तस्वीर से अलग संकेत दिए। अलीगढ़ लोकसभा सीट के तहत आने वाले खैर क्षेत्र में सपा ने बीजेपी पर करीब 1,400 वोटों की बढ़त बनाई।
यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि 2022 में बीजेपी ने यहां विधानसभा चुनाव में बड़े अंतर से जीत हासिल की थी। 2024 में बीजेपी और आरएलडी के बीच गठबंधन था, जबकि सपा और कांग्रेस एक साथ चुनाव मैदान में थे। इस चुनाव में प्रत्याशियों की सामाजिक पृष्ठभूमि और गठबंधन भी स्थानीय वोटों के बंटवारे में महत्वपूर्ण कारक रहे।
उपचुनाव में फिर बीजेपी की वापसी
लोकसभा चुनाव के बाद खैर विधानसभा सीट खाली हुई और नवंबर 2024 में उपचुनाव कराया गया। बीजेपी ने सुरेंद्र दिलेर को मैदान में उतारा, जबकि सपा की ओर से चारू कैन उम्मीदवार बनीं।
उपचुनाव में बीजेपी के सुरेंद्र दिलेर को 1,00,181 वोट मिले और उन्होंने सपा की चारू कैन को 38,393 वोटों के अंतर से हराया। चारू कैन को 61,788 वोट मिले, जबकि बसपा के पहल सिंह 13,365 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
इस परिणाम ने यह भी दिखाया कि लोकसभा चुनाव में मिले स्थानीय समीकरण विधानसभा उपचुनाव में उसी रूप में कायम नहीं रहे।
2027 में किन सामाजिक समूहों पर रहेगी नजर?
खैर के मौजूदा चुनावी गणित में जाट मतदाता सबसे बड़ा समूह बताए जाते हैं। इसके बाद एससी और ब्राह्मण मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। मुस्लिम, क्षत्रिय, वैश्य और विभिन्न अति पिछड़ी जातियों के मतदाता भी कुल परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं।
उपलब्ध अनुमानों के अनुसार खैर में जाट मतदाता करीब 1.15 लाख, एससी मतदाता करीब 65 हजार, ब्राह्मण करीब 45 हजार और मुस्लिम मतदाता करीब 30 हजार के आसपास बताए जाते हैं। इसके अलावा क्षत्रिय, बनिया, कश्यप, सूर्यवंशी, नाई, प्रजापति, सैनी और अन्य समुदायों की भी चुनाव में हिस्सेदारी है।
पिछले चुनावों से क्या संकेत मिलते हैं?
खैर की चुनावी राजनीति में पिछले कुछ चुनावों के परिणाम अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक गठबंधनों के प्रभाव को दिखाते हैं। 2007 और 2012 में आरएलडी ने यहां जीत दर्ज की थी, जबकि 2002 में बसपा के खाते में सीट गई थी। बीजेपी ने 1991, 1996, 2017 और 2022 में जीत दर्ज की। 2024 के उपचुनाव में भी बीजेपी ने सीट बरकरार रखी। चुनाव आयोग के पुराने आंकड़ों में भी खैर को विधानसभा क्षेत्र संख्या 71 और एससी आरक्षित सीट के रूप में दर्ज किया गया है।
समाजवादी पार्टी अभी तक खैर विधानसभा सीट पर जीत दर्ज नहीं कर सकी है। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में खैर क्षेत्र में सपा को मिली बढ़त ने पार्टी के लिए इस सीट के सामाजिक समीकरण को लेकर नई संभावनाओं की चर्चा जरूर बढ़ाई थी।
2027 के लिए मुकाबले का आधार क्या होगा?
2027 में खैर सीट पर उम्मीदवारों के चयन के साथ-साथ गठबंधन की स्थिति भी महत्वपूर्ण होगी। आरक्षित सीट होने के कारण प्रत्याशी एससी वर्ग से होगा, लेकिन चुनावी रणनीति में जाट, एससी, ब्राह्मण, मुस्लिम और अन्य पिछड़े वर्गों के बीच समर्थन का संतुलन अहम रहेगा।
2022 विधानसभा चुनाव, 2024 लोकसभा चुनाव और उसके बाद हुए उपचुनाव के नतीजों में अंतर यह बताता है कि खैर में मतदाताओं का व्यवहार चुनाव-दर-चुनाव बदल सकता है। इसलिए 2027 के लिए जातीय आंकड़े केवल आधारभूत तस्वीर देते हैं; अंतिम चुनावी समीकरण प्रत्याशियों, गठबंधनों और उस समय के स्थानीय मुद्दों पर भी निर्भर करेगा।
written by Siddhi Srivastava



